दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक संगठन ब्रह्माकुमारीज संस्थान की

अंतरराष्ट्रीय मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी दादी जानकी का 104 साल की उम्र में देहावसान

दादीजी का जीवन परिचय-

– 1916 में हैदराबाद सिंध प्रांत में जन्म

– 1970 में पहली बार विदेश सेवा पर आध्यात्म का संदेश लेकर निकलीं

– 2007 में ब्रह्माकुमारीज की मुख्य प्रशासिका के रूप में संभाली संस्थान की कमान

– 100 देशों में अकेले पहुंचाया राजयोग मेडिटेशन और आध्यात्म का संदेश

– 140 देशों में हैं ब्रह्माकुमारीज संस्थान के सेवा केंद्र

– 12 लाख से अधिक भाई-बहन वर्तमान में संस्थान से जुड़े हैं

– 14 वर्ष तक उन्होंने की थी गुप्त योग-साधना

– 80 फीसदी चीजें उम्र के आखिरी पड़ाव में भी रखती थीं याद।

 

दादी के जीवन से जुड़ीं महत्वपूर्ण बातें… 

– 91 वर्ष की उम्र में नियुक्त की गईं थीं ब्रह्माकुमारीज की मुखिया

-140 देशों में स्थित संस्थान के 8500 सेवा केंद्र का करतीं थी कुशल संचालन

– इतनी उम्र में भी अल सुबह ब्रह्यमुहूर्त में 4 बजे से हो जाती थीं ध्यान मग्न    

– विश्व की सबसे स्थिर मन की महिला का है वर्ल्ड रिकार्ड

– पिछले साल की थी 50 हजार किमी की यात्रा

– 12 घंटे विश्व सेवा में रहती थीं तत्पर

 

दादी के सुविचार…. 

जीवन में कभी भी झूठ मत बोलो 

मानवीय मूल्यों को बांटो 

ईश्वर पर भरोसा रखो 

नया जीवन जियो 

झूठ नहीं बोलोगे तो हमेशा स्वस्थ रहोगे 

मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहो 

अपने देश से प्यार करो.

उनको कई देशों ने नागरिकता देने के लिए कहा था लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया.

लोगों की ज़िन्दगी में नई रौशनी भरने का काम करो 

 

दादीजी द्वारा लिखी पुस्तकें-

– विंग्स ऑफ सोल, 1999 में हीथ कम्युनिकेशन द्वारा

– पल्र्स ऑफ विजडम, 1999 में हेल्थ कम्युनिकेशन द्वारा

– कम्पेनिंस ऑफ गॉड, 1999 में बीके आईएस द्वारा

– इनसाइड आउट, 2003 में बीके आईएस द्वारा

 

दादी जी की जीवन यात्रा

– 2005 में अमेरिका की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी द्वारा दादीजी को करेज ऑफ कशेन्स अवार्ड से नवाजा गया।

– जून 2005 में काशी ह्यूमानाटेरियन अवार्ड से नवाजा गया।

– 1996 में दुनिया के 60 से अधिक देशों में बच्चों को सिखलाई जा रही लिविंग वैल्यूज इन एजुकेशन इनिशियेटिव का शुभारंभ यूनिसेफ के साथ मिलकर किया।

27 मार्च को आबू रोड राजस्थान स्थित  महिलाओं द्वारा संचालित दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक संगठन ब्रह्माकुमारीज संस्थान की मुख्य प्रशासिका तथा स्वच्छ भारत मिशन कि ब्रांड अम्बेसडर राजयोगिनी दादी जानकी का 104 वर्ष की उम्र में देहावसान हो गया। माउण्ट आबू के ग्लोबल हास्पिटल में 27 मार्च को प्रातः 2 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्हें पिछले दो महीने से श्वांस तथा पेट की तकलीफ थी जिसका इलाज चल रहा था। उनका अंतिम संस्कार ब्रह्माकुमारीज के अन्तर्राष्ट्रीय मुख्यालय शांतिवन में सम्मेलन सभागार के सामने स्थित ग्राउण्ड में दोपहर 3.30 बजे किया जायेगा। 

नारी शक्ति की प्रेरणास्रोत राजयोगिनी दादी जानकी का जन्म 1 जनवरी, 1916 को हैदराबाद सिंध, पाकिस्तान में हुआ था। उन्होंने 21 वर्ष की उम्र में ही ब्रह्माकुमारीज संस्थान के आध्यात्मिक पथ को अपना लिया था और पूर्णरुप से समर्पित हो गयी थी। आध्यात्मिक उड़ान में शिखर छू चुकी राजयोगिनी दादी जानकी मात्र चौथी तक पढ़ी थी। लेकिन आध्यात्मिक आभा से भरपूर भारतीय दर्शन, राजयोग और मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए 1970 में पश्चिमी देशों का रुख किया। दुनिया के 140 देशों में मानवीय मूल्यों का बीजारोपण किया तथा हजारों सेवा केन्द्रों की स्थापना कर लाखों लोगों को एक नयी जिन्दगी दी।

रायजोगिनी दादी जानकी ने पूरे विश्व में मन, आत्मा की स्वच्छता के साथ बाहरी स्वच्छता के लिए अनोखा कार्य किया, जिसके लिए भारत सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन की ब्रांड अम्बेसडर बनाया था। दादी जानकी के देहावसान की खबर सुनते ही देश विदेश के संस्था के करोड़ों अनुयाइयों ने भावभीनी श्रद्धांजलि के लिए योग साधना प्रारम्भ कर दी है। उनके पार्थिव शरीर को माउण्ट आबू से आबू रोड के शांतिवन लाया जायेगा। भावभीनी श्रद्धांजलि के पश्चात पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो जायेगा । इस तरह 46 हज़ार ब्रम्हकुमारी बहनों कि आलौकिक माँ का साथ छूट जायेगा। इस सूचना से पूरे विश्व में दुख की लहर है। 

दादीजी के प्रति संस्थान के देश-विदेश के 8500 सेवा केंद्र पर योग-साधना जारी 

ब्रह्माकुमारीज के मैनेजिंग ट्रस्टी और मीडिया प्रभाग के अध्यक्ष बीके करुणा ने बताया कि आदरणीय दादी मां जानकीजी को  2007 में संस्थान की मुखिया नियुक्त किया गया था। दादीजी के कुशल मार्गदर्शन में दुनियाभर के 140 देशों में फैले प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के 8500 से अधिक सेवा केंद्रों का संचालन किया जा रहा था। दादीजी की अथक मेहनत, त्याग-तपस्या के चलते भारतीय पुरातन संस्कृति आध्यात्म और राजयोग मेडिटेशन का संदेश उन्होंने अकेले विश्व के 100 से अधिक देशों में पहुंचाया। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे 12 घंटे जन की सेवा में सक्रिय रहती थी।

अमेरिका के टेक्सास मेडिकल एवं साइंस इंस्टीट्यूट में वैज्ञानिकों द्वारा परीक्षण के बाद दादीजी को मोस्ट स्टेबल माइंड ऑफ द वल्र्ड वूमन से नवाजा था। उन्होंने योग से अपने को मन इतना संयमित, पवित्र, शुद्ध और सकारात्मक बना लिया था कि वह जिस समय चाहें, जिस विचार या संकल्प पर और जितनी देर चाहें, स्थिर रह सकती थीं। दादीजी को लोग देखकर, सुनकर, मिलकर प्रेरित हुए हैं जो आज एक अच्छी जिंदगी के राही हैं। उनका एक-एक शब्द लाखों भाई-बहनों के लिए मार्गदर्शक और पथप्रदर्शक बन जाता था। ब्रह्माकुमारी के संस्थापक ब्रह्माबाबा के सान्निध्य में आपने 14 वर्ष तक गुप्त तपस्या की।

यूरोपीय देशों में कुछ यूं किया था उन्होंने अध्यात्म का शंखनाद…

जब लोग खुद को कार्यों सेवानिवृत्त समझ लेते हैं उस समय 60 साल की उम्र में वर्ष 1970 दादी जानकीजी पहली बार विदेशी जमीं पर मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिकता का बीज रोपने के लिए निकलीं।  दादी ने सबसे पहले लंदन से वर्ष 1970 में ईश्वरीय संदेश की शुरुआत की। यहां वर्ष 1991 में कई एकड़ क्षेत्र में फैले ग्लोबल को-ऑपरेशन हाऊस की स्थापना की गई। धीरे-धीरे यह कारवां बढ़ता गया और यूरोप के देशों में आध्यात्म का शंखनाद हुआ। दादी के साथ हजारों की संख्या में बीके भाई-बहनें जुड़ते गए। दादीजी की कर्मठता, सेवा के प्रति लगन और अथक परिश्रम का ही कमाल है कि अकेले विश्व के सौ देशों में भारतीय प्राचीन संस्कृति आध्यात्मिकता एवं राजयोग का संदेश पहुंचाया। बाद में यह कारवां बढ़ता गया और आज 140 देशों में लोग राजयोग मेडिटेशन का अभ्यास कर रहे हैं।  

37 साल रहीं विदेश में

दादी जानकी ने वर्ष 1970 से वर्ष 2007 तक 37 वर्ष विदेश में अपनी सेवाएं दीं। इसके बाद वर्ष 2007 में संस्था की तत्कालीन मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी दादी प्रकाश मणि के शरीर छोड़ने के बाद वह 27 अगस्त को ब्रह्मा कुमारी की मुख्य प्रशासिका नियुक्त की गईं।  तब से लेकर आज तक वह संस्था को कुशलतापूर्वक नेतृत्व करते हुए लाखों लोगों की प्रेरणापुंज बनी रहीं।

इस भोजन से उन्होंने रखा था खुद को फिट… 

दादी शरीर को ठीक और खुद को हल्का रखने के लिए सुबह नाश्ते में दलिया, उपमा और फल लेती थीं।  दोपहर में खिचड़ी, सब्जी लेना पसंद करती थीं। रात में सब्जियों का गाढ़ा सूप उनका पसंदीदा आहार था। दादी वर्षों से तेल-मसाले वाले भोजन से परहेज करती रहीं। भोजन करने का उनका समय भी निर्धारित था। दादी का कहना था कि हम जैसा अन्न खाते हैं वैसा ही हमारा मन होता है। इसलिए सदा भोजन परमात्मा की याद में ही करना चाहिए। हमारे मन का भोजन से सीधा संबंध होता है। 

“मैं कौन और मेरा कौन”…

दादी कहती थीं कि सब बाबा का कमाल है। सदा एक ही बात याद रखती हूं मैं कौन (एक आत्मा) और मेरा कौन (परमात्मा)। मन में हर पल एक ही संकल्प परमात्मा की याद का चलता है। बाबा देने के लिए बैठा है, दिया है दे रहा है। राजयोग मेडिटेशन तन एवं मन दोनों की दवा है। आज इसकी सभी को आवश्यकता है। परिवर्तन संसार का नियम है.  रात-दिन का चक्र चलता है। यदि जीवन में नवीनता नहीं तो वह नीरस हो जाएगा। हर दिन, हर पल नया सोचें, नया करें और जीवन पथ पर आगे बढ़ते रहें। आने वाले समय में और समस्याएं बढ़ेंगी इसके लिए सभी को योगबल बढ़ाने की जरूरत है। सबका ड्रामा में अपना-अपना पार्ट है। सदा मन में एक ही संकल्प चलता है मैं कौन और मेरा कौन। परमात्मा की याद बगैर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाती हूं। हर संकल्प में उसकी याद समायी हुई रहती है। बाबा को याद नहीं करना पड़ता है बाबा स्वत: याद आता है। मन को मारो नहीं सुधारो। उसका भटकना बंद करो। एक शिव बाबा में सदा बुद्धि के तार लगे रहेंगे तो मन स्थिर हो जाएगा।

देश विदेश में मिला सम्मान… 

दादी को विदेश में सेवा के दौरान कई देशों में अंतरराष्ट्रीय अवार्ड से भी नवाजा गया। इसके अलावा भारत में भी कई अवार्ड से पुरस्कृत किया गया। मूल्यनिष्ठा,  शिक्षा एवं आध्यात्मिकता में विश्वरभर में सराहनीय योगदान देने पर दादीजी को वर्ष 2012 में गीतम विश्वविद्यालय, विशाखापट्नम ने डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया।

 लंदन ने किया था दादी को सम्मानित…

आध्यात्मिक एवं धार्मिक लोगों के एक संगठन कीपर्स ऑफ विजडम की दादी सदस्य थीं। विश्व स्तर पर मानव आवास एवं पर्यावरण की समस्याओं से संबंधित अनेक आध्यात्मिक रूप से द्विविधा ग्रस्त स्थितियों के समाधान के लिए यह संगठन कार्य करता है। दादीजी की इसमें अहम भूमिका थी। दादी जी के सम्मान में वर्ष 1977 में लंदन में जानकी फाउंडेशन फॉर ग्लोबल हेल्थकेयर की स्थापना की गई।