Archana Sharma

इंसान को अपनी पहचान बनाने के लिए कुछ ऐसा जरूर करना पड़ता है जिसे समाज याद रखे। ऐसी ही प्रतिभा के धनी हैं जौनपुर निवासी राष्ट्रीय युवा पुरस्कार विजेता देव भास्कर पांडे। युवावस्था से ही उनको स्वच्छता का संदेश देना, लोगों को जागरूक करना और  कहीं जरूरत पड़े तो स्वयं ही लग जाना। उनके इसी सामाजिक कार्य को 1990-91 में तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय युवा पुरस्कार से सम्मानित किया। खास बात यह है कि यह सामाजिक कार्य आज भी 54 वर्ष की उम्र में उसी लगनशीलता के साथ किया जा रहा है जो  महज 18 वर्ष की उम्र में प्रारंभ किया गया था।

देव भास्कर पांडे ने  जहां स्वच्छता अभियान के लिए कार्यक्रम किए, अभियान चलाए, जागरूकता संदेश दिए। इसके साथ साथ उन्होंने “देवालय से पहले” एक खंडकाव्य की भी रचना की। इस खंडकाव्य के माध्यम से उन्होंने संदेश दिया कि देवालयों से पहले  शौचालय का निर्माण ज्यादा महत्वपूर्ण है। असमय अकाल मौत जो गंदगी से पनपी बीमारियों की देन है उसे श्री पांडे दुर्भाग्य पूर्ण मानते हैं। इसी के चलते उन्होंने क्षेत्र में हजारों की संख्या में शौचालयों का निर्माण सरकार की योजनाओं के तहत करवाया जिससे हजारों परिवार गंदगी का शिकार होने से बज गए। उनका संकल्प है कि वह क्षेत्र  का एक भी घर ऐसा नहीं छोड़ना चाहते हैं जहां शौचालय न बना हो। 

वर्तमान में देव भास्कर पांडे स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के जिला संयोजक के रूप में सामाजिक कार्यों से जुड़े हैं।

श्री पाण्ड्य कहते हैं कि एक मंत्री थे जिनसे स्वछता पर चर्चा हो रही थी तो उन्होंने कहा कि देवालय से पहले शौचालय, मतलब कि लोगों को शौचालय बनवाना चाहिये। 

बस इसी पर उन्होंने खण्डकाव्य का नाम “देवालय से पहले” रखा।

खंडकाव्य के लिये उन्होंने स्वच्छता को ही क्यों चुना, सवाल पर उन्होंने बताया कि उनके बड़े भाई थे जिनको पोलियी हो गया था वो भी गंदगी के कारण, दरअसल खुले में शौच करने से जो वायरस पैदा होता है उससे पोलियो की बीमारी ज़्यादा होने की संभावना रहती है। उन्होंने कहा कि गंदगी से होने वाली मौत अज्ञानता की वजह से होती है। स्वच्छता और साक्षरता दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों का प्रचार प्रसार समाज में ज़रूरी है। 

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में आज भी 20 प्रतिशत से अधिक लोग शौचालय का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।

श्री पांडे कहते हैं कि मेरा जन्म 1965 में हुआ था, 18-19साल का जब था तभी से सामाजिक कार्यों से जुड़ गया था। इंटर करते ही टेक्सटाइल में स्पोर्ट्स कोटे से नौकरी मिल गई थी। नौकरी में कभी मन नहीं लगा, चूंकि घर चलाना था तो नौकरी के साथ ही सामाजिक कार्यों में भी जुड़े रहे। खंडकाव्य का पहला एडिशन पंचायती राज्य निदेशालय द्वारा छपवाया गया था। मेरी सरकार से मांग है कि खंडकाव्य “देवालय से पहले” को परिषदीय स्कूल और माध्यमिक स्कूल के पाठ्यक्रम में लगवाया जाए ताकि बच्चों को गंदगी से होने वाली बीमारियों के प्रति जानकारी दी जा सके।

एक रिपोर्ट के अनुसार साल में लोग 6 से 7 हज़ार रुपये सिर्फ गंदगी से होने वाली बीमारी पर खर्च कर देते हैं।  जबकि यही पैसा ज़रा सी सतर्क रहने पर बच सकता है। मैंने जापान, सिंगापुर, थाईलैंड सहित करीब 12 देशों में जाकर स्वच्छता पर अध्य्यन किया,  तब जाकर खंडकाव्य की रचना की। 

श्री पांडे को राष्ट्रीय युवा पुरस्कार साक्षरता, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्रीय एकता एवं सद्भावना, श्रमिकों के उन्नयन के लिये काम करने को 1990-91 में तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने प्रदान किया था। उनका कहना है की वो मरते दम तक इस अभियान से जुड़े रहेंगे और लोगों को स्वछता,साक्षरता, स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करते रहेंगे।