गुरुवार व सिद्धि योग व उदया तिथि मिलने से बना यह अद्भुत संयोग

साफ न बोल पाने वालों को सरस्वती जी की पूजा का मिलेगा लाभ

इस बार बसंत पंचमी पर ऐसा अद्भुत संयोग बन रहा है कि अगर विधि विधान से पूजा की गई तो तोतला बोलने वालों के लिए यह पूजा काफी लाभकारी होगी। इस अद्भुत संयोग में बसंत की पूजा तोतली जुबान मैं काफी सुधार हो सकता है ऐसा कहना है ज्योतिष आचार्यों का। यह संयोग करीब 26 वर्षों बाद आया है। दरअसल इस बार बसंत पंचमी का दिन गुरुवार होने और उदया तिथि के साथ ही सिद्धि योग का संयोग बसंत पंचमी को गत वर्षो की अपेक्षा इस बार खास बना रहा है। 

आचार्य योगेश अवस्थी बताते हैं कि इस बार बसंत पंचमी पर जो संयोग  बना है वह करीब 26 वर्षों बाद मिला है। वह बताते हैं कि जो बच्चे सही से बोल नहीं पाते अर्थात तोतले हैं तो इस बार सरस्वती जी की पूजा विधि विधान से करने पर लाभ मिलेगा। इसके साथ ही  यह पूजा उन बच्चों के लिए भी लाभकारी होगी जिनका मन पढ़ाई में नहीं लगता है।

ऐसे करें सरस्वती पूजन सरस्वती जी की पूजा पीली चुनरी ओढ़ाकर केसर अथवा हल्दी का तिलक  लगाएं । चने की दाल चढ़ाएं और पीले फूल की माला पहनाए। अगर आप सरस्वती जी की पूजा संगीत के साथ करेंगे तो उसका लाभ और ज्यादा बढ़ जाएगा। पूजा के समय यदि पीले वस्त्र धारण किए जाएं तो उससे सरस्वती पूजा और फलदाई बन जाएगी। 

 

प्राकृतिक सौंदर्य के अधिष्ठाता हैं ऋतुराज बसंत

ज्योतिषाचार्य पंडित दीपक पांडये बसंत पंचमी का शास्त्रोक्त वर्णन करते हुए कहते हैं  कि ज्ञान और बुद्धि की देवी मां सरस्वती आराधना का दिन है बसंत पंचमी। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी बसंत पंचमी कहलाती है। एक तरफ ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा इस दिन की जाती है तो दूसरी तरफ प्राकृतिक सौंदर्य के अधिष्ठाता ऋतुराज बसंत के  शुभारंभ का प्रतीक भी इसे माना जाता है। पंचमी को समृद्धि का प्रतीक कहा जाता है इसीलिए ही बसंत पंचमी को श्री पंचमी भी कहते हैं। इस दिन पीले वस्त्र धारण करने और पीला व्यंजन खाने की परंपरा है। पीला वस्त्र पहनने का सबसे ज्यादा प्रचलन महाराष्ट्र राजस्थान और उत्तर प्रदेश में देखा गया है। राजस्थान में महिलाएं पीली साड़ी और लहंगे, ओढ़नी आदि पहनती हैं तो पश्चिम बंगाल में बसंत पंचमी बड़े उल्लास के साथ मनाई जाती है और सरस्वती पूजा भी की जाती है। पूर्वी प्रदेश के कई हिस्सों में बसंत पंचमी पर तो लोग फाग और होली गीत भी गाते हैं और आज ही के दिन से ही फाग गाने का सिलसिला भी शुरू हो जाता है जोकि फाल्गुन मास की पूर्णिमा तक चलता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने की भी परंपरा मानी गई है। बसंत को चैत्र वैशाख मास भी कहा जाता है। दरअसल चीन ज्योतिष में बसंत ऋतु के चैट और वैशाख महीने में मनाया जाने का वर्णन मिलता है। 

 ऐसा कहा जाता है कि माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण ने मां सरस्वती जी की पूजा अर्चना की थी तभी से देवी सरस्वती को इस दिन पूजने  का प्रचलन शुरू हो गया। भगवान श्री कृष्ण ने कहा था कि हे देवी ब्रह्मांड में प्रतिवर्ष माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन आस्था के साथ तुम्हारी पूजा की जाएगी। तभी से बसंत पंचमी को सरस्वती जी की पूजा का प्रचलन शुरू हो गया।

ऐसे करें पूजा.. 

पंचमी को अबूझ मुहूर्त माना गया है. इस दिन बिना किसी पंडित या ज्योतिष से पूछे कोई भी मांगलिक कार्य किया जा सकता है। सरस्वती जी का वाहन हंस है जो जल, आकाश, पृथ्वी तीनों पर चलता है। वह नीर क्षीर को अलग कर देता है। जिस व्यक्ति पर सरस्वती की कृपा दृष्टि हो उस पर महाकाली और महालक्ष्मी स्वयं प्रसन्न हो जाती है। मां सरस्वती की पूजा के दौरान मां को श्वेत वस्त्र पहनाए, साथ ही मां को दूध,  दही, मक्खन सफेद तिल के लड्डू, गेहूं की बाली सफेद रंग की मिठाई और सफेद पुष्प अर्पित करें। इस आराधना के दौरान मां सरस्वती के मंत्रों का भी उच्चारण अपनी राशि के अनुसार करें।


मां सरस्वती के जन्मदिवस के रूप में हम बसंत पंचमी मनाते हैं। मां सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनकी आराधना राशि अनुसार करें। ज्ञान, बुद्धि और विवेक का शुभ आशीष पाएं….

मेष : ॐ शारदैय नम:।

वृषभ : ॐ अनुराधाय नम:।

मिथुन : ॐ ज्ञानदायिनी नम:।

कर्क : ॐ पुस्तकधारिणी नम:।

 सिंह :ॐ भयहारिणी नम:।

कन्या : ॐ मातृरूपेण नम:।

तुला : ॐ सरस्वते नम:।

वृश्चिक : ॐ विद्यारूपेण नम:।

धनु : ॐ मंत्ररूपेण नम:।

मकर : ॐ हंसवाहिनी नम:।

कुंभ : ॐ जीवनदायिनी नम:।

मीन : ॐ बह्म ज्ञायिनी नम:।