• कवियों व साहित्यकारों ने बसंत का किया है रोचक वर्णन
  • अंग्रेजी कवियों ने भी की है बसंत की रोमांटिक व्याख्या 

RAJAT SAXENA/ARCHANA SHARMA

चाहे हिंदी साहित्यकार हो या फिर अंग्रेजी साहित्यकार सभी ने बसंत पर अपनी लेखनी चलाकर शानदार वर्णन किया है। किसी ने प्रेम गीत तो किसी ने विरह गीत के माध्यम से इसे भारत का वैलेंटाइन बना दिया है। भारतीय प्राचीन काल में बसंत को प्रेम का इजहार करने का मास माना जाता रहा है। इस बात पर पुख्ता मोहर देश के कवियों और साहित्यकारों ने अपनी अपनी रचनाओं से भी लगाई है। चाहे भारतेंदु हरिश्चंद्र हो या मलिक मोहम्मद जायसी या सुभद्रा कुमारी चौहान या माखनलाल चतुर्वेदी या सोहनलाल द्विवेदी व मनोज भावुक फिर आज के गोपालदास नीरज सभी ने अपनी-अपनी तरह से बसंत को समझा और जाना और फिर किसी ने प्रेम गीत तो किसी ने विरह गीत की माला में बसंत को पिरो दिया। जो युवाओं के लिए खासा रोचक बन पड़ा है। 

जैसे वैलेंटाइन डे की प्रेम के इजहार का दिन माना जाता है ठीक उसी तरह पौराणिक कथाओं के अनुसार बसंत को कामदेव का पुत्र कहा गया है। इस बारे में एक कवि देव बसंत ऋतु का वर्णन करते हुए कहते हैं कि रूप व सौंदर्य के देवता कामदेव के घर जब पुत्र जन्म की सूचना आती है तो प्रकृति झूम उठती है, पेड़ पौधों के नव पल्लव उसके लिए पालना डाल देते हैं, फूल वस्त्र पहन आते हैं, पवन झूलती है और कोई ऐसे गीत सुना कर बहलाती है। भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद् भागवत गीता में कहा है कि ‘ऋतुओं मे मैं बसंत हूं’. तो दूसरी और संगीत में एक विशेष राग पसंद के नाम पर भी बनाया गया है जिसे राग बसंत कहते हैं। बसंत राग पर चित्र भी बनाए गए हैं।

हिंदी साहित्य की प्रवक्ता अध्यक्षा व प्राचार्य डॉ गायत्री सिंह कहती हैं कि वसंत को ऋतुराज की संज्ञा दी गई है. बसंत की रागात्मिका अभिवृत्ति का पुष्ट प्रमाण है. बसंत इसलिए भी ऋतुराज है क्योंकि शीत की दुरूहता  से भी मुक्ति का आभास सहृदय जनमानस को कराता है। बसंत ऋतु में पेड़ों पर कलियां प्रकट हो जाती हैं और हवा बड़ी ही सुहावनी और सुखद प्रतीत होती है और हमारे चारों ओर की सुगंध मधुर हो जाती है। जहां एक ओर मनोज भावुक अपनी कविता ‘ बसंत आया पिया ना आए’ मे विरह गीत से बसंत के महत्व को समझते है तो दूसरी ओर मशहूर गीतकार व कवि गोपालदास ‘नीरज’ ने ‘ आज बसंत की रात गमन की बात न करना’ कविता से श्रृंगार रस का वर्णन कर बसंत को प्रेमी प्रेमिका के मिलन का खास दिन भी बताते है तो इसी तरह आज के जाने माने कवि भी अपनी रचनाओं से बसंत का कुछ यूँ वर्णन कर रहे है। कवि मनीष मीत की बताते हैं कि जिसके मन में बसंत नहीं वो संत तो हो सकता परन्तु साहित्यकार कदापि नहीं। इस दुनिया के जिस-जिस भू भाग पर भी ऋतुराज ने अपने कदम रखे हैं वहाँ के साहित्य ने उसे अपने आलिंगन में भरकर असीमित प्रेम का अनुभव करते हुए उसको आधार बनाकर अनेक रचनाओं का सृजन हर काल में किया है अर्थात इस भूमण्डल पर कोई भी कवि-साहित्यकार ऐसा नही है जिसने अपनी रचनाओं में बसन्त ऋतु का वर्णन न किया हो। उदाहरण के रूप में अंग्रेज़ी साहित्यकार विलियम वर्ड्सवर्थ ने अपनी कालजयी रचना ‘डेफोडिल्स’ में बसन्त ऋतु के आगमन का अत्यंत मनोरम एवं अनुपम वर्णन किया है उनकी दृष्टि में बसन्त के आगमन पर दूर-दूर तक फैले डेफोडिल के हज़ारों पीले फूलों का मंद-मंद चलती बयार के संपर्क में आते ही अपनी सुध-बुध खो देना और कभी इधर तो कभी उधर झुकना और लहराना मानो ऐसा प्रतीत हो रहा हो जैसे कि किसी स्थिर सागर में अकस्मात लहरें नृत्य करने लगे।

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डॉ कीर्ति काले

बागों में बिखरी है बहार 

कलियों पर आया है निखार

फिर हवा निगोड़ी झूम झूम

बौराई घूमें द्वार द्वार 

धरती ने ली खुलकर मादक अंगड़ाई है,

सब जान गए हैं ऋतु वासन्ती आई है।

 

सरसों ने पी ली भंग पुनः

महुआ पीटे मिरदंग पुनः

अम्बुआ की डाली पर छेड़ी

कोयल ने मीठी जंग पुनः

बूढ़े बरगद पर भी आई तरुणाई है ।

सब जान गए हैं ऋतु वासन्ती आई है।।

 

दर्पण दर्पण है धुला धुला

बन्धन हो जैसे खुला खुला

मदमाती मस्त हवाओं में

नमकीन नशा सा घुला घुला

रंगीन शरारत मन्द मन्द मुस्काई है ।

सब जान गए हैं ऋतु वासन्ती आई है।।

 

बृजमण्डल की रंगत न्यारी

सुध बुध भूली राधा प्यारी

सरररररररररररररर

बनवारी मारे पिचकारी

जमुना जल में मौसम ने भंग मिलाई है ।

सब जान गए हैं ऋतु वासन्ती आई है।।

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डॉ कमलेश द्विवेदी

(1) रह पाएगा किस तरह, कब तक कोई संत।

     जब  संयम के  तार को, छेड़े स्वयं वसंत।।

(2) ऐसे   में कैसे   कभी, कोई होगा   संत।

     बौराये हैं आम तक, जब से लगा बसंत।।

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डॉ सर्वेश अस्थाना

जब उनकी याद हो अनंत समझो बसन्त है
जब अंगड़ाइयां ले सन्त तो समझो बसंत है।
जब खुद से ही शरमाये खुद दर्पण निहार कर,
मादक लगे जब दिग दिगन्त समझो बसन्त है।।

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मनीष मीत

सरस्वती वंदना….

मेरी  माँ वीणापाणि, तू  ही जग की कल्याणी,

कुहुक कोयल की तुझसे, तू ही स्वर की महारानी,

वेदों  का उच्चारण  तू ही, तू सन्तों  की वाणी,

मेरी माँ वीणापाणि….

 

विराजे  बुद्धि ध्वज  पे, ज्ञान चरणों की रज पे,

हाथ  मे वेद  लिए माँ, सुशोभित  है पंकज पे,

श्वेत  आवरण धारी  जिसकी हंस करें अगवानी,

मेरी माँ वीणापाणि….

 

ह्रदय रख सच का दर्पण, विकारों का कर तर्पण,

परिश्रम   निष्ठा पूजा,  करे सर्वस्व जो  अर्पण,

विद्योत्मा  के कालिदास भी बन जाते हैं ज्ञानी,

मेरी माँ वीणापाणि….

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जयराम जय 

आया बसंत है

अचेतन  चित्त को  चेतना दे,

सजे पादप पादप छाया बसंत है।

दिशाओं -दिशाओं  में ढाले सुरा,

सुधियों की समृद्धि को लाया बसंत है।

प्रसून – प्रसून  कली – कली में,

मधुकोष अनंत ले आया बसंत है।

विनोद  प्रमोद मनों  मनों में,

खिले  यौवन में  लहराया है बसंत है।

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डॉ.रश्मि कुलश्रेष्ठ

आये हैं ऋतुराज सखी

आये हैं ऋतुराज सखी।
मन में बाजे साज सखी।

जियरा पिउ पिउ पिउ पिउ बोले।
तन मन बेसुध डगमग डोले।
मन है पिय दर्शन का प्यासा।
पिय हिय में बसने की आशा।
कँगना खोले राज सखी।

कुंजन-कुंजन कोयल कूके।
सुन-सुन मेरा जियरा हूके ।
मधु ऋतु में सब हैं बौराये।
मन की गति कुछ कही न जाये।
कहते आये लाज सखी।

कागा ने डेरा डाला है।
परदेसी आने वाला है।
रोम-रोम इतना आल्हादित।
मन सुगंध से हुआ सुवासित।
नींद गई है भाज सखी।

मालकोस भौंरे यों गायें।
मन में स्वप्न सलोने आयें।
लगते कर हल्दी से राँचे।
पंडित लग्न-पत्रिका बाँचे।
होगा मंगल काज सखी।