• 5 अंक के जातकों को भोले बाबा की पूजा अर्चना करने से बनी रहती है बाबा की कृपा दृष्टि
  • भोले बाबा के जीवन में 5 अंक का महत्व समाज को संगठित होने और एक होकर रहने का संदेश भी देता है

Archana Sharma

शिव जी के परिवार में उनको मिलाकर पांच सदस्य हैं, जिनके 5 वाहन भी हैं। माता पार्वती जहां शेर की सवारी करती हैं तो भोले बाबा नंदी की सवारी, गणेश जी चूहा तो कार्तिकेय जी मोर की सवारी करते हैं और बाबा के गले में सर्प है। वैसे तो देखा गया है कि यह सभी पशु-पक्षी आपस में एक दूसरे के शत्रु हैं मगर भोले बाबा के परिवार में यह सभी एक दूसरे के साथ एकता और सद्भावना के साथ रहते हैं जो कि इस समाज को यह संदेश देता है कि हमें संगठित और एक होकर रहना चाहिए। यहां खास बात यह है कि जिन जातकों का मूलांक 5 है अर्थात जिनका जन्म 5, 14 अथवा 23 तारीख को किसी भी महीने में हुआ है उन पर भोले बाबा की विशेष कृपा दृष्टि रहती है। मगर उन जातकों को भी निराश होने की आवश्यकता नहीं जिनका जन्म इन मूलांकों के अंतर्गत नहीं आता क्योंकि हमारा शरीर भी पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश ) से मिलकर बना है, इसलिए भोले बाबा की कृपा प्रत्येक व्यक्ति और प्राणी पर सदैव बनी रहती है। ज्योतिषाचार्य कथावाचक कर्मकांड विशेषज्ञ पंडित दीपक कृष्ण महाराज वृंदावन बताते हैं कि भोले बाबा की कृपा दृष्टि न केवल पांच के मूलांक वाले लोगों पर बल्कि सभी व्यक्तियों पर बनी रहती है मगर जरूरत है तो सिर्फ यह की हमें जीवन में समाज हित के लिए कार्य करना चाहिए। ईश्वर भी उन्हीं से प्रसन्न होते हैं जो दीन दुखियों, जरूरतमंदों आदि की मदद करते हैं। चूंकि हमारे हाथों में 5 उंगलियां हैं जो कि संगठित होकर जब एक मुट्ठी का रूप लेती है तो उसे खोल पाना किसी के लिए भी संभव नहीं होता। इसी तरह भोले बाबा के जीवन में भी जो 5 का अंक है वह समाज को संगठित और एक होकर रहने का संदेश देता है। 

 कुछ इस तरह भोले बाबा के जीवन से जुड़ा है 5 का अंक….

 भोले बाबा के जीवन में 5 अंक का महत्व उनके परिवार से ही देखा जा सकता है। भोले बाबा के परिवार में भोले बाबा सहित 5 सदस्य शामिल हैं। माता पार्वती जी उनके पुत्र गणेश जी, कार्तिकेय जी और नंदी बाबा जी। तो उनका मंत्र ‘नमः शिवाय’ भी पांच अक्षर का है। शिव जी के पूजन के लिए भी कुछ तिथियों का ही विशेष महत्व है, अर्थात कुछ विशेष तिथियां हैं जिन पर अगर भोले बाबा की पूजा की जाए तो अक्षय फल की प्राप्ति होती है जैसे कृष्ण और शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि में ही शिव जी का वास होता है। हिंदू धर्म में सभी तिथियों के देवता होते हैं ठीक उसी तरीके से भोले बाबा की भी तिथि चतुर्दशी मानी गई है जिसका मूलांक भी पांच है। पंचमुखी रुद्राक्ष भी भोले बाबा को प्रिय है। भोले बाबा के अभिषेक में पांच वस्तु दूध, दही, चीनी, घी और शहद का विशेष महत्व माना गया है। पृथ्वी,  आकाश, वायु, अग्नि इन पांच तत्वों के शिवलिंग भी दक्षिण भारत में स्थित है। 12 ज्योतिर्लिंगों के साथ कैलाश मानसरोवर, अमरनाथ तीर्थ स्थल भी हैं जिनका मूलांक भी पांच ही है। 

ये हैं बाबा के पंचभूत मंदिर… 

दक्षिण भारत में भोले बाबा के पंचभूत मंदिर स्थित है। बाबा के शिवलिंग पंचभूतों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। जल का प्रतिनिधित्व करने वाला मंदिर तिरुवनैकवल में है, तो आग का प्रतिनिधित्व करने वाला मंदिर तिरुवन्नम्मलई में है, हवा का प्रतिनिधित्व करने वाला मंदिर कालाहस्ती में है, पृथ्वी का प्रतिनिधित्व वाला मंदिर कांचीपुरम में है और आकाश का प्रतिनिधित्व करने वाला मंदिर चिदंबरम में स्थित है। यहाँ 5 अंक के जातकों द्वारा की गई पूजा कभी भी खाली नहीं जाती। हालांकि जो 5 अंक के जातक नहीं है वह भी यहां पर विधि विधान से पूजा करके भोले बाबा की विशेष कृपा प्राप्त कर सकते हैं। महाशिवरात्रि  को बाबा शिव का विवाह हुआ था और इसी दिन ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव भी माना गया है। इसीलिए इस दिन अगर इन पंचभूत मंदिर में पूजा अर्चना की जाए तो बाबा की कृपा हमेशा भक्तों पर बनी रहती है। मगर आप अगर किसी विषम परिस्थिति में होने की वजह से इन मंदिरों में पूजा अर्चना को नहीं जा पाते हैं तो भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है। ज्योतिष आचार्यों की माने तो ‘ॐ शव्वार्य क्षितिमूर्तये नमः ‘ मंत्र का जाप करते हुए किसी मंदिर अथवा घर पर है भले बाबा की प्रतिमा अथवा शिवलिंग पर फूल चढ़ायें ऐसा करने से बाबा की कृपा आप पर ठीक वैसी है बनेगी जैसी की आप मंदिर में जाकर पूजा करते हैं। 

 

(1) जल का प्रतिनिधित्व करने वाला मंदिर 

     श्री जम्बूकेश्वर मंदिर तिरुवनैकवल त्रिचिरापल्ली (तमिलनाडु)

देवालय परिचय के द्वारा आज आपको शिव् जी के दक्षिण भारत स्थित चौथे तत्व अर्थात जल तत्व समर्थित मंदिर से परिचय करा रहा है।इस तत्व के मंदिर का नाम श्री जम्बूकेश्वर है, जो त्रिची या त्रिचिरापल्ली (तमिलनाडु) से लगभग छह-सात किलोमीटर दूर तिरुवनैकवल में स्थित है है। यहाँ मंदिर में जम्‍बूलिंगेश्‍वर और अखिलेन्‍द्रेश्‍वरी जी प्रतिष्ठित है। त्रिची का यह दोनों ही मंदिर चोल वंश के राजाओं द्वारा निर्मित है। यह मंदिर लगभग 1800 साल पुराना है। मंदिर का प्रांगण इतना बड़ा है कि उसकी परिधि 8000 फीट है तथा चारदीवारी बहुत ऊंची एवं चौड़ी बनी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह प्रचलित है कि जब कैलाश पर्वत पर भगवान शिव शांत मुद्रा में थे तो माता पार्वती उन्हें देखकर हंस पड़ीं जिस पर नाराज होकर भगवान शिव ने उन्हें यह आदेश दिया कि किसी गुप्त स्थान पर मेरी आराधना करो। अत: माता पार्वती ने कावेरी के तट पर जामुन के घने जंगलों में तपस्या की और अपनी दैविक शक्ति से कावेरी के थोड़े से जल को लेकर शिवलिंग बनाया और उसकी पूजा की। इस स्‍थान पर देवी पार्वती ने अखिलेश्‍वरी देवी का रूप धारण किया था।जिस स्‍थान पर माता पार्वती ने तपस्‍या की थी, वहां वर्तमान में मंदिर स्थित है एवम उनके द्वारा जल से निर्मित शिवलिंग गर्भगृह में स्थापित है।जल तत्वके कारण इस स्थान को अप्पू स्थलम् और शिवलिंग को अप्पुलिंगम भी कहते है। जम्‍बूकेश्‍वरा गर्भगृह के नीचे पानी का एक स्‍त्रोत भी है समय के साथ – साथ, जल का यह स्‍त्रोत खाली हो गया, इसे भरने का काफी प्रयास किया जाता है। मंदिर के पवित्र परिसर में एक टैंक स्थित है जिसे पंचभूथास्‍तलम कहा जाता है, यह पवित्र पानी का कुंड है। ऐसा माना जाता है कि इसमें स्‍नान करने से सभी पाप धुल जाते है और आपको मोक्ष की प्राप्ति होती है। वास्‍तव में, मंदिर में स्थित शिवलिंग को इसी ताजे पानी के स्‍त्रोत से जल की धारा मिलती है। कहा जाता है कि इसी स्थान पर पार्वती जी के तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान् शिव जी ने पार्वती माता जी को दर्शन दिया और उपदेश दिया इस कारण इस स्थान को उपदेश स्थलम् भी कहते है। इस मंदिर में शिव पार्वती का विवाह नहीं होता है क्योंकि उपदेश देने के कारण यहाँ गुरु और शिष्या का सम्बन्ध है।

 

(2) आग का प्रतिनिधित्व करने वाला मंदिर

     अरुणाचलेश्वर मंदिर, तिरुवन्नमलई

तिरुवन्नमलई में अरुणाचलेश्वर मंदिर अन्नामलाई हिल की तलहटी में स्थित है और हिंदुओं के लिए पूजा का एक प्रमुख स्थान है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और शिव अनुयायियों के लिए इसका बहुत अधिक महत्व है। इस मंदिर में एक शिवलिंग है जो भगवान शिव का प्रतिनिधि है और यहाँ पर भगवान की पूजा उनकी पत्नी पार्वती के साथ होती है जो यहाँ उन्नमुलइयम्मा के रूप में स्थित है। यह मंदिर अग्नि तत्व का प्रतिनिधि है और भगवान शिव की पूजा अग्नि शिवलिंग के रूप में की जाती है। इस मंदिर का उल्लेख ’नयनार’ कहे जाने वाले तमिल संत कवियों के विहित कार्य में किया गया है। वास्तव में, यह देश के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है और 10 हैक्टेयर भूमि पर बना हुआ है। इस मंदिर को गोपुरम नामक चार प्रवेशद्वार टावरों के साथ भव्यता से बनाया गया है। सबसे ऊँचा गोपुरम पूर्व दिशा में है और इसकी 66मी. की ऊँचाई इसे भारत का सबसे ऊँचा गोपुरम बनाती है। इस गोपुरम में 11 मंजि़लें बनी हुई है।

 

(3) हवा का प्रतिनिधित्व करने वाला मंदिर

    श्रीकालाहस्ती मंदिर, चित्तूर, आंध्रप्रदेश 

श्रीकालाहस्ती मंदिर आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले में तिरुपति शहर के पास स्थित श्रीकालहस्ती नामक कस्बे में एक शिव मंदिर है। ये मंदिर पेन्नार नदी की शाखा स्वर्णामुखी नदी के तट पर बसा है और कालहस्ती के नाम से भी जाना जाता है। दक्षिण भारत में स्थित भगवान शिव के तीर्थस्थानों में इस स्थान का विशेष महत्व है। ये तीर्थ नदी के तट से पर्वत की तलहटी तक फैला हुआ है और लगभग २००० वर्षों से इसे दक्षिण कैलाश या दक्षिण काशी के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के पार्श्व में तिरुमलय की पहाड़ी दिखाई देती हैं और मंदिर का शिखर विमान दक्षिण भारतीय शैली का सफ़ेद रंग में बना है। इस मंदिर के तीन विशाल गोपुरम हैं जो स्थापत्य की दृष्टि से अनुपम हैं। मंदिर में सौ स्तंभों वाला मंडप है, जो अपने आप में अनोखा है। अंदर सस्त्रशिवलिंग भी स्थापित है, जो यदा कदा ही दिखाई देता है।[1] यहां भगवान कालहस्तीश्वर के संग देवी ज्ञानप्रसूनअंबा भी स्थापित हैं। देवी की मूर्ति परिसर में दुकानों के बाद, मुख्य मंदिर के बाहर ही स्थापित है। मंदिर का अंदरूनी भाग ५वीं शताब्दी का बना है और बाहरी भाग बाद में १२वीं शताब्दी में निर्मित है। मान्यता अनुसार इस स्थान का नाम तीन पशुओं – श्री यानी मकड़ी, काल यानी सर्प तथा हस्ती यानी हाथी के नाम पर किया गया है। ये तीनों ही यहां शिव की आराधना करके मुक्त हुए थे। एक जनुश्रुति के अनुसार मकड़ी ने शिवलिंग पर तपस्या करते हुए जाल बनाया था और सांप ने लिंग से लिपटकर आराधना की और हाथी ने शिवलिंग को जल से स्नान करवाया था। यहाँ पर इन तीनों पशुओं की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं। श्रीकालहस्ती का उल्लेख स्कंद पुराण, शिव पुराण और लिंग पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार एक बार इस स्थान पर अर्जुन ने प्रभु कालहस्तीवर का दर्शन किया था। तत्पश्चात पर्वत के शीर्ष पर भारद्वाज मुनि के भी दर्शन किए थे। कहते हैं कणप्पा नामक एक आदिवासी ने यहाँ पर भगवान शिव की आराधना की थी। यह मंदिर राहुकाल पूजा के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।

 

(4) पृथ्वी का प्रतिनिधित्व वाला मंदिर

     एकाम्बरेश्वर मंदिर, कांचीपुरम, तमिलनाडु

‘एकाम्बरेश्वर मंदिर’ यह तमिलनाडु के प्रसिद्ध कांचीपुरम स्थित, पृथ्वी तत्त्व का प्रतिनिधित्व करने वाला मंदिर है। पृथ्वी तत्त्व होने के कारण ही इस मंदिर का शिवलिंग मिट्टी का बना हुआ है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिए आम के वृक्ष के नीचे माता पार्वती ने मिट्टी के शिवलिंग की तप-आराधना की थी, यही वह शिवलिंग है। इसीलिए इसे एकाम्बरेश्वर मंदिर कहा जाता है। तमिल भाषा में एकाम्बरेश्वर अर्थात् आम के वृक्ष वाले देवता। आज भी मंदिर के परिसर में एक बहुत प्राचीन आम का वृक्ष लगा हुआ है। कार्बन डेटिंग जाँच के अनुसार इस वृक्ष की आयु भी लगभग साढ़े तीन हजार वर्ष पुरानी ही निकली है। इस आम के वृक्ष को चार वेदों का प्रतीक समझा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस एक ही पेड़ से चार भिन्न-भिन्न स्वादों के आम निकलते हैं।

 

 

 

(5) आकाश का प्रतिनिधित्व करने वाला मंदिर 

     तिलई नटराज मंदिर, चिदम्बरम, तमिलनाडु

तिलई नटराज मंदिर आकाश तत्त्व का प्रतिनिधित्व करने वाला यह मंदिर तमिलनाडु के चिदम्बरम शहर में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि स्वयं पतंजलि ऋषि ने इस मंदिर की स्थापना की थी। इसलिए ठीक-ठीक कहना कठिन है कि इस मंदिर का निर्माण कब हुआ। परन्तु इसकी भी देखभाल एवं मरम्मत पल्लव, चोल एवं विजयनगर साम्राज्य के राजाओं द्वारा पाँचवी शताब्दी में की गई, इसका उल्लेख ग्रंथों में मिलता है। इस मंदिर के अंदर ‘भरतनाट्यम’ नृत्य की विभिन्न 108 मुद्राओं को पत्थर के स्तंभों पर उकेरा गया है। इसका अर्थ यही है कि भरतनाट्यम नामक नृत्य शास्त्र भारत में कुछ हजार वर्षों से पहले से ही काफी विकसित था। मंदिर में पत्थर के अनेक स्तंभों पर भगवान शंकर की अनेक मुद्राएं भले ही खुदी हुई हों, परन्तु नटराज की मूर्ति एक भी नहीं बनाई गई है। यह मूर्ति केवल गर्भगृह में ही विराजमान है। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान शंकर, नटराज के रूप में हैं और साथ में शिवकामी अर्थात् पार्वती की मूर्ती भी है। अलबत्ता नटराज रूपी शिव प्रतिमा के दाँयी तरफ थोड़ा सा रिक्त स्थान है, जिसे ‘चिदंबरा रहस्यम’ कहा जाता है। इस खाली स्थान को स्वर्ण की गिन्नियों वाले हार से सजाया जाता है। यहाँ की मान्यता के अनुसार यह रिक्त स्थान, खाली नहीं है, बल्कि वह आकारहीन आकाश तत्त्व है। पूजा के समय को छोड़कर बाकी के पूरे समय पर यह रिक्त स्थान लाल परदे से आच्छादित रहता है। पूजा करते समय लाल परदा सरका कर उस आकारहीन शिव तत्त्व अर्थात् आकाश तत्त्व की भी पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ पर शिव एवं कालीमाता के रूप में पार्वती, दोनों ने नृत्य किया था।