• छोड़ना होगा विदेश का मोह व English के पीछे भागना 
  • वेबिनार में महामारी के बाद की स्थिति पे किया गया चिंतन 

Covid-19 महामारी के बाद ग़रीबों और पिछड़े क्षेत्रों में विशेष कार्य करने की आवश्यकता होगी। हमें विदेश का मोह छोड़ना होगा तथा ये भ्रम निकलना होगा कि अंग्रेज़ी के बिना काम नहीं हो सकता विश्व के बड़े- बड़े देश अपनी भाषा में काम कर रहे हैं। हम सबको भी इसी राह पे चलना होगा। यह सुझाव IIM lucknow के प्रोफेसर बीके मोहंती ने दिये। मौका था नेताजी सुभाष चंद्र बोस राजकीय महिला महाविद्यालय अलीगंज, लखनऊ द्वारा आयोजित  वेबिनार का।
यहाँ वैश्विक महामारी कोविड से उत्पन्न चुनौतियों को लेकर एक अंतर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन ऑनलाइन किया गया। वेबिनार के प्रमुख वक्ता के रूप में मौजूद लंदन स्कूल आफ़ इक्नामिक्स से सम्बद्ध तथा केंद्र एवं विभिन्न राज्य सरकारों में रणनीतिक सलाहकार के रूप में कार्य कर रहे विश्व विख्यात विद्वान पार्थो पी कर ने कोविड के पश्चात उत्पन्न होने वाली आर्थिक एवं सामाजिक चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि तेरहवीं तथा चौदहवीं शताब्दी में जब यूरोप के देशों में प्लेग महामारी फैली तो लोगों का चर्च की संस्था में विश्वास लगभग समाप्त हो गया था। यह इक्कीसवी शताब्दी है कोविड के पश्चात सबसे ज़रूरी होगा कि विभिन्न सरकारी संस्थाओं में लोगों का विश्वास बना रहे। उन्होंने कहा कि कोविड के बाद सामाजिक विषमता में कमी आएगी तथा लगभग अस्सी प्रतिशत लोग सामाजिक समानता की ओर बढ़ेंगे। उन्होंने कहा कि अब विकास की धारा शहरों से गाँव की ओर करनी होगी। श्री पार्थो ने ये भी कहा कि अभी जनवरी,  फ़रवरी तक ऐसी स्थिति रह सकती है ये भी हो सकता है की शिक्षण व्यवस्था एक सत्र पीछे चली जाये।अब ग्रामीण मज़दूरों को सौ दिन का नहीं बल्कि वर्ष भर का काम देने पर विचार करने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि एक सकारात्मक प्रभाव ये हो सकता है कि हम पुनः संयुक्त परिवार प्रथा की ओर लौट आयें। श्री पार्थो ने कहा कि अकेले हमारे अमीर होने से काम नहीं चलेगा अमीर होकर एक गरीब देश में रहने से अच्छा है कि हम अमीर होकर अमीर देश में रहें तभी जीवन का आनंद उठा पायेंगे। जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष तथा साउथ एशियन विवि दिल्ली के प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी ने अपने संबोधन में कहा की कोविड के बाद 1930 जैसी मंदी हो सकती है तथा विश्व अर्थव्यवस्था तीन प्रतिशत तक गिर सकती है। ऐसे में रोज़गार पर तथा जन स्वास्थ्य पर बहुत प्रयास करना होगा। सेमिनार की सार्थकता ये रही कि लगभग सभी वक्ता सहमत रहे कि ग्रामीण रोज़गार जन स्वास्थ्य ग़रीबों को सुविधाओं पर तथा महिला शिक्षा सुरक्षा पर सभी एकमत रहे।
अनेक वक्ता इस पर चिंतित दिखे कि भारत जैसे उत्सवधर्मी देश जहां रोज़ ही तमाम तरह के सामाजिक, धार्मिक आयोजन होते रहते हैं शायद अब हाल फ़िलहाल ऐसा करना मुमकिन न हो सके। वहीं अनेक प्रतिभागियों ने इस पर भी चिंता व्यक्त की कि कोविड के पश्चात डिप्रेशन घरेलू हिंसा एवं बाल अपराध जैसी घटनाएं बढ़ सकती हैं। प्राचार्य प्रोफेसर अनुराधा तिवारी ने अतिथियों प्रतिभागियों आदि का स्वागत करते हुये कहा कि आज के परिवेश में शिक्षकों की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण हो गई है। शिक्षण में आमूलचूल परिवर्तन के लिए हमें खुद को अप्डेट रखना होगा उन्होंने कहा कि देश का आत्मविश्वास बनाये रखने में हमारा बड़ा उत्तरदायित्व है। प्राचार्य ने कहा कि अब हमें वैश्वीकरण के मायाजाल से निकलकर महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज एवं लघु उद्योगों के प्रति अपनी धारणा बनानी होगी। उन्होंने कहा कि गांधी आज फिर प्रासंगिक हो गये हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस संगोष्ठी के विचारों का व्यापक प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए। संगोष्ठी का सफल आयोजन डॉक्टर जय प्रकाश वर्मा ने किया। उन्होंने विभिन्न विद्वानों तथा प्रतिभागियों के बीच एक सेतु के रूप में कार्य किया। संगोष्ठी की समन्वयक डॉक्टर श्वेता भारद्वाज ने सभी के प्रति आभार प्रदर्शन किया। इस ऑनलाइन संगोष्ठी में देश विदेश के अनेक विद्वान,  शिक्षक, शोधार्थी तथा विद्यार्थियों ने प्रतिभाग किया। देर तक चले सवाल जवाब के क्रम में अनेक लोगों ने प्रश्न किये जिसका वक्ताओं ने जवाब दिया। प्रमुख रूप से डॉ बृजबाला, डॉ. रश्मि बिस्नोई, डॉ शिवानी, डॉ शरद वैस्य,  डॉ क्रांति, डॉ प्रतिमा, डॉ भास्कर शर्मा आदि मौजूद रहे।