- लैब में तैयार होंगी इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाएं
- मधुमेह से ग्रस्त चूहों पर प्रयोग रहा सफल
- करोड़ों बच्चों की सुरक्षित हो सकेगी जिंदगी
- स्वीडन के Karolinska Institutet और KTH Royal Institute of Technology में हुई खोज
स्टॉकहोम। टाइप-1 डायबिटीज के उपचार की दिशा में वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। स्वीडन के Karolinska Institutet और KTH Royal Institute of Technology के शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में ऐसी इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाएं विकसित की हैं, जो शरीर की प्राकृतिक बीटा कोशिकाओं की तरह कार्य करने में सक्षम हैं। इस शोध को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Stem Cell Reports में प्रकाशित किया गया है।
Karolinska Institutet की आधिकारिक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, टाइप-1 डायबिटीज में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अग्न्याशय की इंसुलिन उत्पादक बीटा कोशिकाओं को नष्ट कर देती है, जिसके कारण मरीज को जीवनभर बाहरी इंसुलिन पर निर्भर रहना पड़ता है। इसी समस्या के समाधान के लिए वैज्ञानिकों ने मानव स्टेम सेल की मदद से नई इंसुलिन उत्पादक कोशिकाएं तैयार कीं।
शोधकर्ताओं ने बताया कि नई तकनीक से विकसित कोशिकाएं पहले की तुलना में अधिक परिपक्व और प्रभावी हैं। ScienceDaily में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, इन कोशिकाओं को मधुमेह से ग्रस्त चूहों में प्रत्यारोपित किया गया, जिसके बाद उनके ब्लड शुगर स्तर में उल्लेखनीय सुधार देखा गया और लंबे समय तक ग्लूकोज नियंत्रित रहा।
शोध दल से जुड़े प्रोफेसर Per-Olof Berggren ने Karolinska Institutet को दिए बयान में कहा कि यह तकनीक भविष्य में“पर्सनलाइज्ड सेल थेरेपी” का आधार बन सकती है। इससे मरीजों के लिए ऐसी कोशिकाएं तैयार की जा सकेंगी, जिन्हें शरीर आसानी से स्वीकार कर सके।
रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों ने कोशिकाओं को त्रि-आयामी (3D) संरचना में विकसित किया, जिससे उनकी गुणवत्ता और ग्लूकोज के प्रति प्रतिक्रिया बेहतर हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक स्टेम सेल आधारित डायबिटीज उपचार की पुरानी चुनौतियों को दूर करने में मददगार साबित हो सकती है।
हालांकि यह शोध अभी पशु परीक्षण तक सीमित है, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय इसे मधुमेह चिकित्सा विज्ञान में एक बड़ी उपलब्धि मान रहा है। यदि आगामी मानव परीक्षण सफल रहते हैं, तो भविष्य में टाइप-1 डायबिटीज के स्थायी उपचार की दिशा में यह तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
(संदर्भ: Karolinska Institutet Research Report, ScienceDaily, Stem Cell Reports Journal)



