- राष्ट्रीय गीत को मिलेगा राष्ट्रीय गान जैसा वैधानिक संरक्षण
नई दिल्ली। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के सम्मान की रक्षा के लिए बड़ा कदम उठाया है। देश की यह पहली सरकार है जिसने वंदे मातरम् के अपमान करने पर दंड के विधान को लागू करने का काम किया है। केंद्रीय कैबिनेट ने राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। संसद से पारित होने के बाद अब वंदे मातरम् के गायन में जानबूझकर बाधा डालना, अपमान करना या अवमानना करना दंडनीय अपराध माना जाएगा।
सरकार के इस फैसले का उद्देश्य देश की राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक वंदे मातरम् को वही कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है, जो वर्तमान में राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’, राष्ट्रीय ध्वज और संविधान को प्राप्त है।
क्या है ‘वंदे मातरम्’ का इतिहास?
‘वंदे मातरम्’ भारत की स्वतंत्रता चेतना का सबसे शक्तिशाली उद्घोष माना जाता है। इसे महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने संस्कृत और बंगला मिश्रित भाषा में लिखा था। यह गीत उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में प्रकाशित हुआ, जो वर्ष 1882 में सामने आया।
यह गीत केवल साहित्यिक रचना नहीं रहा, बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन का युद्धघोष बन गया। क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी और आंदोलनकारी “वंदे मातरम्” का उद्घोष करते हुए अंग्रेजी शासन का विरोध करते थे।
पहली बार कब गाया गया?
‘वंदे मातरम्’ पहली बार वर्ष 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था। उस समय महान कवि और नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे स्वर दिया था। इसके बाद यह गीत पूरे देश में राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गया।
कब मिला राष्ट्रीय गीत का दर्जा?
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान सभा में इस विषय पर लंबी चर्चा हुई। अंततः 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने ‘जन गण मन’ को राष्ट्रीय गान और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि दोनों को समान सम्मान दिया जाएगा।
किन महान नेताओं ने किया समर्थन?
‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में अनेक स्वतंत्रता सेनानियों और विचारकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
- महात्मा गांधी ने इसे राष्ट्र की आत्मा बताया था।
- अरविंद घोष ने इसके अंग्रेजी अनुवाद के माध्यम से इसे विश्वभर में पहचान दिलाई
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे संगीतबद्ध कर जन-जन तक पहुंचाया।
- लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और अनेक क्रांतिकारियों ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरक मंत्र बनाया।
ब्रिटिश शासन के दौरान कई स्थानों पर “वंदे मातरम्” बोलने और गाने पर प्रतिबंध तक लगाए गए, लेकिन इसके बावजूद यह नारा स्वतंत्रता सेनानियों की आवाज बना रहा।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का यह कदम राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को और मजबूत करेगा। इससे राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान बढ़ेगा तथा सार्वजनिक कार्यक्रमों में जानबूझकर व्यवधान उत्पन्न करने वालों पर कानूनी कार्रवाई संभव हो सकेगी
‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता, संस्कृति और राष्ट्रभक्ति की अमर पहचान है। आज भी यह गीत करोड़ों भारतीयों के मन में देशप्रेम की भावना जगाता है।



