“भतीजे प्रेम में डूबी तृणमूल की नैया, संगठन का बिखराव बना पतन की वजह — रजत सक्सेना की सीधी कलम से“

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस का उदय संघर्ष, जनाधार और ममता बनर्जी के मजबूत नेतृत्व का परिणाम था लेकिन आज वही पार्टी संगठनात्मक असंतोष, नेतृत्व को लेकर उठते सवालों और परिवारवाद के आरोपों से घिरी दिखाई दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के भीतर लंबे समय से पनप रही असहमति को समय रहते न समझ पाना ही वर्तमान संकट की बड़ी वजह है।
इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण वरिष्ठ नेता का है। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले शुभेंदु अधिकारी का तृणमूल कांग्रेस छोड़कर में शामिल होना केवल एक नेता का दल बदल नहीं था, बल्कि तृणमूल की आंतरिक कमजोरी का सार्वजनिक प्रदर्शन था। नंदीग्राम आंदोलन से लेकर पार्टी के विस्तार तक शुभेंदु अधिकारी को ममता बनर्जी का सबसे विश्वसनीय सहयोगी माना जाता था। राजनीतिक गलियारों में उन्हें ममता बनर्जी का “अभिन्न अंग” कहा जाता था।
सवाल यह है कि जिस नेता ने वर्षों तक पार्टी को गांव-गांव तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसके भीतर बढ़ रही नाराजगी को नेतृत्व क्यों नहीं भांप सका? यदि उस समय पार्टी नेतृत्व ने संगठन के भीतर संवाद और संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया होता, तो संभवतः इतना बड़ा राजनीतिक नुकसान टाला जा सकता था। शुभेंदु अधिकारी का जाना इस बात का संकेत था कि पार्टी के भीतर कुछ गंभीर असंतोष मौजूद है, जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है।

इसके बाद पार्टी में सांसद की बढ़ती भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हुईं। विरोधियों ने आरोप लगाया कि संगठनात्मक अनुभव और वरिष्ठता की अपेक्षा पारिवारिक निकटता को अधिक महत्व दिया जा रहा है। चाहे यह धारणा सही हो या गलत, लेकिन राजनीति में जनधारणा का महत्व वास्तविकता से कम नहीं होता। यदि कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच यह संदेश जाता है कि शीर्ष पदों तक पहुंचने का मार्ग सीमित है, तो संगठनात्मक उत्साह प्रभावित होना स्वाभाविक है।
आज जब पार्टी के भीतर कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों की असहमति सार्वजनिक हो रही है, तब यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या तृणमूल कांग्रेस ने शुभेंदु अधिकारी प्रकरण से कोई सबक लिया था? यदि लिया होता, तो शायद असंतोष के स्वर इतने मुखर न होते। राजनीतिक दलों का क्षरण अचानक नहीं होता; वह छोटी-छोटी उपेक्षाओं, संवादहीनता और नेतृत्व की गलत प्राथमिकताओं का परिणाम होता है।
ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस को अपने संघर्ष और जनसमर्थन से खड़ा किया था। लेकिन किसी भी राजनीतिक दल की दीर्घकालिक सफलता केवल एक नेता की लोकप्रियता पर नहीं, बल्कि मजबूत संगठन, सामूहिक नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के विश्वास पर निर्भर करती है। यदि पार्टी में यह धारणा मजबूत होती है कि संगठन से अधिक महत्व परिवार या कुछ चुनिंदा व्यक्तियों को दिया जा रहा है, तो उसका असर देर-सवेर चुनावी परिणामों और संगठनात्मक एकजुटता दोनों पर दिखाई देता है।
शुभेंदु अधिकारी का प्रस्थान एक चेतावनी थी। यदि उस चेतावनी को गंभीरता से लिया जाता, तो शायद आज तृणमूल कांग्रेस को बार-बार अपने ही घर से उठ रहे सवालों का सामना न करना पड़ता। राजनीति में विपक्ष से लड़ना अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन अपने ही संगठन में पैदा हो रहे असंतोष को संभालना कहीं अधिक कठिन। तृणमूल कांग्रेस के सामने आज यही सबसे बड़ी चुनौती है।



