विश्व संकट से पहले भारत की तैयारी पर विस्तृत समीक्षा रजत सक्सेना की सीधी कलम से
क्या भारत फिर आत्मनिर्भरता, संतुलन और अनुशासन के बल पर दुनिया को राह दिखाने की तैयारी कर रहा है?
जब दुनिया युद्ध, ऊर्जा संकट, आर्थिक अस्थिरता और महाशक्तियों की टकराहट के अंधेरे में घिरती दिखाई दे रही है, तब भारत में उठ रही कुछ आवाजें केवल सरकारी अपील नहीं लगतीं, बल्कि आने वाले समय की दूरदर्शी चेतावनी जैसी महसूस होती हैं।
पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की लगातार बढ़ती कीमतों के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा ईंधन बचाने, अनावश्यक यात्राएं कम करने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने, साइकिल के प्रयोग को बढ़ावा देने, वीआईपी संस्कृति में फिजूल ईंधन खर्च रोकने और संयमित जीवनशैली अपनाने की अपील को अब केवल महंगाई प्रबंधन के नजरिये से नहीं देखा जा सकता। यह उस भारत की तैयारी भी हो सकती है, जो आने वाले वैश्विक संकट के सामने झुकना नहीं चाहता।
दुनिया इस समय अस्थिरता के सबसे खतरनाक दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने पहले ही वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है। अब ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव तेल बाजार को असुरक्षित बना रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता, समुद्री मार्गों पर खतरा, तेल आपूर्ति की अनिश्चितता और डॉलर की मजबूती पूरी दुनिया में महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ा रही है।
उधर चीन अपनी आर्थिक और सामरिक शक्ति का विस्तार कर रहा है। वैश्विक व्यापार, तकनीक और सप्लाई चेन पर उसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। रूस ऊर्जा और युद्धनीति के माध्यम से विश्व राजनीति को प्रभावित कर रहा है। अमेरिका डॉलर, प्रतिबंधों और सामरिक दबाव के जरिए वैश्विक संतुलन बनाए रखने की कोशिश में है।
इन महाशक्तियों की गतिविधियों का सीधा असर भारत पर पड़ता है।
- तेल महंगा होता है तो भारत का आयात बिल बढ़ता है।
- डॉलर मजबूत होता है तो रुपया दबाव में आता है।
- वैश्विक मंदी बढ़ती है तो रोजगार और उद्योग प्रभावित होते हैं।
- समुद्री मार्ग असुरक्षित होते हैं तो व्यापार और सप्लाई चेन पर असर पड़ता है।
ऐसे समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल विकास की नहीं, बल्कि संतुलन और आत्मनिर्भरता बनाए रखने की है।
यह भारत के लिए कोई नई सोच नहीं है। देश ने पहले भी संकट के समय त्याग और अनुशासन के बल पर खुद को संभाला है।

साल 1965 में जब देश युद्ध और खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था, तब प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने की अपील की थी। उस समय भारत अमेरिका के PL-480 कार्यक्रम के तहत विदेशी गेहूं पर निर्भर था। विदेशी सहायता में आने वाले लाल गेहूं और उससे बनने वाले “लाल आटे” की चर्चा आम थी। यह केवल खाद्यान्न संकट नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान का संकट भी था।
शास्त्री ने उस समय देश को सिखाया कि संकट से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार आत्मसंयम और आत्मनिर्भरता है। उन्होंने स्वयं अपने घर में भी एक समय भोजन छोड़ने का नियम अपनाया। “जय जवान, जय किसान” केवल नारा नहीं था, बल्कि भारत को आत्मनिर्भर बनाने का राष्ट्रीय मंत्र था।
इतिहास गवाह है कि उसी सोच ने आगे चलकर हरित क्रांति की नींव रखी और भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन गया। भारत ने दुनिया के सामने हाथ फैलाने की मजबूरी से खुद को बाहर निकाला।
आज परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन संकट का स्वरूप कहीं न कहीं वैसा ही दिखाई देता है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब लड़ाई अनाज की थी, आज ऊर्जा, तकनीक, मुद्रा और आर्थिक स्थिरता की है।

प्रधानमंत्री मोदी का संयम का संदेश शायद उसी ऐतिहासिक चेतना का आधुनिक रूप है।
ईंधन बचाने की अपील केवल पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने का प्रयास नहीं, बल्कि भारत के धन को विदेश जाने से रोकने की रणनीति भी हो सकती है। जितना अधिक तेल आयात होगा, उतना अधिक विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा और रुपया कमजोर होगा।
इसी तरह सोना कम खरीदने की सलाह भी केवल आर्थिक नसीहत नहीं है। भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातकों में है। यदि देश बड़ी मात्रा में सोना और तेल दोनों आयात करेगा, तो वैश्विक संकट के समय आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में सरकार का “लोकल”, “आत्मनिर्भरता” और “संयम” पर जोर भविष्य की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा कदम माना जा सकता है।
भारत अब केवल संकट से बचने की नहीं, बल्कि संकट के बीच अवसर खोजने की रणनीति पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।
ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, स्वदेशी उत्पादन, रक्षा और तकनीकी साझेदारी, स्टार्टअप और मेक इन इंडिया, ग्रामीण कृषि क्षेत्र को मजबूत करना—ये केवल विकास योजनाएं नहीं, बल्कि आने वाले वैश्विक संघर्षों के बीच भारत को मजबूत बनाए रखने की तैयारी भी हैं।
कोरोना काल में भारत ने दुनिया को दिखाया था कि संकट के समय वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए खड़ा हो सकता है। जब कई शक्तिशाली देश संसाधनों के संकट में जूझ रहे थे, तब भारत ने दवाइयां भेजीं, वैक्सीन भेजीं और “वैक्सीन मैत्री” के माध्यम से विश्व मंच पर अपनी जिम्मेदार शक्ति की पहचान बनाई।
भारत उस दौर में टूटा नहीं, बल्कि और मजबूत होकर उभरा—
नई ऊर्जा के साथ,
नए आत्मविश्वास के साथ।
आज भारत विश्व पटल पर केवल एक विकासशील राष्ट्र नहीं, बल्कि एक संभावित वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में देखा जा रहा है। भारत न युद्ध चाहता है, न प्रभुत्व। भारत शांति, संतुलन और विश्व कल्याण की भूमिका में स्वयं को स्थापित करना चाहता है।
लेकिन विश्व नेतृत्व केवल आर्थिक ताकत से नहीं मिलता। उसके लिए राष्ट्रीय अनुशासन, आत्मसंयम और संकट में सामूहिक धैर्य की आवश्यकता होती है।
पूर्व प्रधानमंत्री स्व लाल बहादुर शास्त्री ने उपवास के माध्यम से भारत को आत्मनिर्भरता का मार्ग दिखाया था। प्रधानमंत्री मोदी संयम के माध्यम से शायद उसी भारत को आने वाले वैश्विक ऊर्जा और आर्थिक संकट के लिए तैयार कर रहे हैं।
क्योंकि इतिहास अंततः उन्हीं राष्ट्रों को महान बनाता है, जो संकट आने से पहले खुद को बदलने का साहस रखते हैं।



