- सपा, भाजपा या फिर कांग्रेस कहां होगा ठिकाना ?
- सीसामऊ और आर्य नगर को लेकर खास चर्चा
- मायावती ने बसपा से किया निष्कासित
कानपुर नगर/VMN (RAJAT SAXENA)। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपने उतार-चढ़ाव और दलों के बीच बदलते सियासी रिश्तों के लिए चर्चित पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा एक बार फिर सुर्खियों में हैं। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने 13 अगस्त 2026 को उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में तत्काल प्रभाव से पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया। मायावती के इस फैसले के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अंटू मिश्रा की अगली राजनीतिक पारी किस दल और किस विधानसभा सीट से होगी।
अंटू मिश्रा के निष्कासन ने कानपुर की सियासत में चर्चाओं को भी हवा दे दी है। राजनीतिक गलियारों में उनके समाजवादी पार्टी में जाने, भाजपा में दोबारा प्रवेश करने और कुछ हलकों में कांग्रेस से नजदीकी बढ़ने की अटकलें लगाई जा रही हैं। इसके साथ ही चर्चा यह भी है कि यदि वह भाजपा में जाते हैं तो सीसामऊ या आर्य नगर समेत कानपुर की किसी सीट से चुनावी मैदान में उतारे जा सकते हैं। दूसरी ओर, सपा में जाने की स्थिति में भी कानपुर की किसी विधानसभा सीट से उन्हें प्रत्याशी बनाए जाने की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक चर्चाएं चल रही हैं।
हालांकि, इनमें से किसी भी दल में अंटू मिश्रा की औपचारिक सदस्यता या 2027 विधानसभा चुनाव के लिए टिकट की घोषणा अभी नहीं हुई है। इसलिए इन चर्चाओं को फिलहाल संभावित सियासी समीकरण और अटकलों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

भाजपा में जाने की कहानी पहले भी अधूरी रह चुकी है
अंटू मिश्रा का भाजपा से जुड़ने का अध्याय नया नहीं है। मार्च 2024 में वह लखनऊ स्थित भाजपा कार्यालय पहुंचे थे। उन्हें पार्टी में शामिल किए जाने की चर्चा थी, लेकिन ऐन वक्त पर उनकी ज्वाइनिंग नहीं हो सकी। वह भाजपा कार्यालय में बैठे, तस्वीरें भी सामने आईं, लेकिन औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता नहीं ली। उस समय अंटू मिश्रा ने खुद कहा था कि भाजपा में उनके मित्र हैं और वह उनसे मिलने गए थे।
यही घटनाक्रम अब उनके बसपा से निष्कासन के बाद फिर चर्चा में है। सवाल यह है कि 2024 में जो दरवाजा बंद रह गया था, क्या 2026 में वही दरवाजा खुलेगा?
सपा से भी जुड़ी रही है चर्चा
अंटू मिश्रा के सपा में जाने की चर्चा भी पहले सामने आ चुकी है। नवंबर 2025 में उनके सपा में प्रवेश और बिठूर से चुनाव लड़ने की अटकलों के बीच पार्टी की स्थानीय इकाई में इसका विरोध हुआ था। स्थानीय सपा नेताओं ने कथित तौर पर उनके प्रवेश के विरोध में प्रस्ताव पारित कर राष्ट्रीय नेतृत्व को भेजा था। हालांकि, अंटू मिश्रा ने उस समय साफ कहा था कि उनकी सपा में शामिल होने की कोई मंशा नहीं है और उन्होंने किसी से संपर्क नहीं किया है।
यही वजह है कि अब बसपा से निष्कासन के बाद सपा का विकल्प फिर चर्चा में आने के बावजूद इसे अभी तय राजनीतिक फैसला नहीं माना जा सकता।
छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर, चार दलों की राह से गुजरे अंटू
अंटू मिश्रा का राजनीतिक सफर अपने आप में कानपुर की राजनीति के बदलते रंगों की कहानी है। कानपुर के क्राइस्ट चर्च कॉलेज की छात्र राजनीति से उन्होंने शुरुआत की। वह छात्रसंघ से जुड़े और बाद में NSUI, युवक कांग्रेस और समाजवादी युवजन सभा से भी जुड़े। इसके बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी का रुख किया।
1993 में उन्होंने सपा के टिकट पर कानपुर की जनरलगंज विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने भाजपा का रुख किया और 2002 में आर्यनगर विधानसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन यहां भी जीत नहीं मिली।
इसके बाद अंटू मिश्रा की राजनीति ने निर्णायक मोड़ लिया और वह बसपा में शामिल हुए। 2007 में उन्होंने कानपुर की सरसौल सीट से बसपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और महज 342 वोटों से चुनाव हार गए। इसके बावजूद बसपा सरकार बनने पर उन्हें स्वास्थ्य राज्य मंत्री बनाया गया। बाद में फर्रुखाबाद सदर विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़कर वह विधायक बने और स्वास्थ्य मंत्री बने।
यानी चुनावी राजनीति में कई बार हार के बावजूद सत्ता के शीर्ष तक पहुंचना अंटू मिश्रा के राजनीतिक सफर की सबसे उल्लेखनीय बातों में रहा।
मायावती के भरोसेमंद खेमे से निष्कासन तक
बसपा में अंटू मिश्रा को पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के करीबी के रूप में देखा जाता रहा है। 2007 में चुनाव हारने के बावजूद उन्हें मंत्री पद मिलना भी उनकी राजनीतिक हैसियत का संकेत माना गया।
लेकिन अब करीब दो दशक बाद कहानी पूरी तरह बदल चुकी है। मायावती ने पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए उन्हें बाहर कर दिया है। यह कदम ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दल अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।
एनआरएचएम विवाद ने भी बदली राजनीतिक दिशा
स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए अंटू मिश्रा का नाम राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एनआरएचएम मामले में सामने आया था। सीबीआई की जांच और बाद की न्यायिक कार्यवाही में उनके खिलाफ आरोप लगाए गए तथा 2018 में विशेष सीबीआई अदालत में आरोप तय किए गए थे। इन आरोपों को यहां अदालत द्वारा लगाए गए दोषसिद्ध आरोप के रूप में नहीं, बल्कि मामले में चली न्यायिक कार्यवाही के संदर्भ में देखना जरूरी है।
इसी प्रकरण के बाद उनकी सक्रिय चुनावी राजनीति में दूरी भी दिखाई दी। 2024 में भाजपा में शामिल होने की कोशिश की खबर और अब 2026 में बसपा से निष्कासन—दोनों घटनाएं बताती हैं कि अंटू मिश्रा के लिए अगली राजनीतिक पारी आसान नहीं होगी।
अब नजर 2027 पर—कौन सा दल देगा मौका?
अंटू मिश्रा के सामने इस समय सबसे बड़ा सवाल सिर्फ कौन सा दल? नहीं, बल्कि कौन सी सीट? भी है।
कानपुर की सीसामऊ सीट राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जाती है। वहीं बिठूर में भी ब्राह्मण मतदाताओं और क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए किसी बड़े चेहरे की एंट्री चुनावी गणित बदल सकती है। इसी के बीच भाजपा को आर्यनगर के लिए एक मजबूत ब्राह्मण चेहरे की बहुत जरूरत है जो सपा के मजबूत ब्राह्मण नेता के रूप में जम चुके विधायक अमिताभ बाजपेई को टक्कर देकर शिकस्त दे सके। इसी कारण राजनीतिक चर्चाओं में इन दोनों सीटों का नाम लिया जा रहा है।
भाजपा के संदर्भ में अंटू मिश्रा की चर्चा इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि वह पहले भाजपा के टिकट पर आर्यनगर से चुनाव लड़ चुके हैं और 2024 में भाजपा में शामिल होने की कोशिश भी सार्वजनिक रूप से चर्चा में रही थी।
सपा के संदर्भ में बिठूर का नाम इसलिए सामने आता रहा है क्योंकि 2025 में उनके सपा में आने और बिठूर से चुनाव लड़ने की चर्चा ने स्थानीय राजनीति में हलचल पैदा की थी। हालांकि उस समय अंटू मिश्रा ने सपा में जाने की बात से इनकार किया था।
कांग्रेस का विकल्प कितना मजबूत?
कांग्रेस का नाम भी राजनीतिक चर्चाओं में लिया जा रहा है, खासकर इसलिए कि अंटू मिश्रा का शुरुआती राजनीतिक जुड़ाव एनएसयूआई और युवक कांग्रेस से रहा है। लेकिन वर्तमान समय में कांग्रेस से उनके टिकट या औपचारिक बातचीत को लेकर कोई पुष्ट घोषणा सामने नहीं आई है। इसलिए कांग्रेस वाला विकल्प भी फिलहाल राजनीतिक अटकल ही है।
एक नेता, कई दल और अब फिर नई राह
अंटू मिश्रा का राजनीतिक सफर देखें तो यह उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीति का दिलचस्प उदाहरण नजर आता है—कांग्रेस के छात्र संगठन से शुरुआत, सपा की राजनीति, भाजपा का टिकट, फिर बसपा में प्रवेश और मायावती सरकार में मंत्री पद तक पहुंचना।
अब बसपा से निष्कासन के बाद उनके सामने एक बार फिर वही सवाल खड़ा है, जो उनके राजनीतिक सफर में कई बार सामने आया है—अगला ठिकाना कौन सा होगा?
- क्या 2024 में अधूरी रह गई भाजपा की सदस्यता 2026 में पूरी होगी?
- क्या सपा पुराने विरोध को पीछे छोड़कर उन्हें अपने साथ लेगी?
- क्या कांग्रेस अपने पुराने राजनीतिक रिश्ते को फिर से सक्रिय करेगी?
- या अंटू मिश्रा कोई ऐसा नया राजनीतिक रास्ता चुनेंगे, जिसकी अभी चर्चा भी नहीं है?
फिलहाल इतना तय है कि बसपा से अंटू मिश्रा की विदाई ने कानपुर की 2027 वाली सियासत में एक नया अध्याय खोल दिया है। टिकट की तस्वीर साफ होने में अभी समय है, लेकिन अंटू मिश्रा के अगले कदम पर कानपुर से लेकर लखनऊ तक राजनीतिक नजरें टिक गई हैं।



