- 150 साल की गौरवगाथा में जुड़ा नया अध्याय
- राष्ट्रगान के बराबर मिला राष्ट्रगीत को सम्मान
नई दिल्ली(RAJAT SAXENA)। ‘वंदे मातरम्’ गाना पड़ेगा नहीं तो जेल जाना पड़ेगा। इसका मतलब यह है कि जिस स्थान पर ‘वंदे मातरम्’ का गायन हो रहा होगा उसका अनादर करने या प्राविधानों के विपरीत स्थिति में पाये जाने पर तीन साल की सजा का प्रावधान भारत सरकार के द्वारा कर दिया गया है। कभी आजादी के आंदोलन का जोशीला उद्घोष रहा ‘वंदे मातरम्’ अब कानूनी संरक्षण के लिहाज से भी राष्ट्रगान के समान खड़ा हो गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 11 अगस्त 2026 को Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 को मंजूरी दे दी।
अब जानबूझकर ‘वंदे मातरम्’ के गायन को रोकना या उसमें व्यवधान डालना अपराध होगा, जिसके लिए तीन वर्ष तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
लेकिन ‘वंदे मातरम्’ की कहानी केवल एक कानून तक सीमित नहीं है। इसकी यात्रा करीब डेढ़ शताब्दी पुरानी है।

1875 में बंकिम की कलम से निकला था ‘वंदे मातरम्’
महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम्’ की रचना 7 नवंबर 1875 के आसपास की। इसकी भाषा संस्कृतनिष्ठ बंगाली थी—अर्थात मूल रचना में बंगाली के साथ संस्कृत शब्दावली का गहरा प्रभाव था। बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया, जो 1882 में प्रकाशित हुआ। भारत सरकार ने 2025 में इसकी रचना के 150 वर्ष पूरे होने पर सालभर का राष्ट्रीय आयोजन किया।
पहली बार किसने गाया?
‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय मंच पर पहली बार 1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन, कलकत्ता में रवींद्रनाथ ठाकुर ने गाया। यही वह क्षण था जब साहित्य की पंक्तियां स्वतंत्रता आंदोलन की सामूहिक आवाज बनने लगीं।
इसके बाद 1905 के बंग-भंग विरोधी आंदोलन में यह गीत स्वदेशी आंदोलन का प्रभावशाली प्रतीक बन गया। अंग्रेजी शासन ने कई जगह इसके सार्वजनिक गायन पर रोक लगाने की कोशिश की, लेकिन आंदोलनकारी प्रतिबंधों के बावजूद इसे गाते रहे।
कितनी भाषाओं में पहुंचा?
समय के साथ ‘वंदे मातरम्’ का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, ओड़िया, मलयालम, असमिया, मराठी, गुजराती, पंजाबी और उर्दू समेत अनेक भाषाओं में इसके अनुवाद/रूपांतरण मिलते हैं। श्री अरविंद का अंग्रेजी अनुवाद विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जबकि आरिफ मोहम्मद खान ने इसका उर्दू अनुवाद किया।
हालांकि इसके कुल कितनी भाषाओं में अनुवाद हुए हैं, इसकी कोई प्रमाणित आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है।
राष्ट्रीय गीत का सम्मान कब मिला?
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मान दिया। वहीं ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान है। दोनों का दर्जा और उपयोग अलग है, लेकिन राष्ट्रीय सम्मान में दोनों का विशेष स्थान है।
2026 में नया अध्याय
गृह मंत्रालय के जुलाई 2026 के आदेश के अनुसार राष्ट्रीय गीत के पूर्ण संस्करण का गायन/वादन लगभग 3 मिनट 10 सेकंड का है। इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस समारोह में पहली बार लाल किले की प्राचीर से ‘वंदे मातरम्’ का गायन भी प्रस्तावित किया गया है।
1875 में बंकिमचंद्र की कलम से निकला ‘वंदे मातरम्’, 1896 में टैगोर के स्वर में राष्ट्रीय मंच पर पहुंचा, 1905 में स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज बना, 1950 में राष्ट्रीय गीत का गौरव पाया और 2026 में कानूनी संरक्षण प्राप्त कर गया। डेढ़ सौ साल की यह यात्रा वास्तव में भारतीय राष्ट्रचेतना की यात्रा भी है।



