- शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती
- बिना आरोप तय किए दोषसिद्धि अस्वीकार्य
- धारा 302 और 364 अलग-अलग अपराध
- पर्याप्त साक्ष्य का अभाव होने पर सजा रद्द
प्रयागराज/VMN। ( विधि संवाददाता) इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि केवल संदेह या शक के आधार पर किसी अभियुक्त को सजा नहीं दी जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस साक्ष्य और विधिवत तय आरोप के दोषसिद्धि न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अपहरण (आईपीसी धारा 364) का आरोप तय ही नहीं किया गया था, जबकि ट्रायल कोर्ट ने उसी धारा में सजा सुना दी। हाईकोर्ट ने इसे गंभीर कानूनी त्रुटि मानते हुए कहा कि हत्या (आईपीसी धारा 302) और अपहरण (आईपीसी धारा 364) अलग-अलग अपराध हैं। यदि आरोपी को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया है, तो बिना आरोप तय किए अपहरण में सजा नहीं दी जा सकती।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार दशम की पीठ ने पाया कि अभियोजन पक्ष अपीलार्थी विनोद कुमार के खिलाफ अपहरण का पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। अदालत ने कहा कि धारा 364 के तहत दोष सिद्ध करने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि अभियुक्त ने अपहरण किया और उसका उद्देश्य हत्या करना था, जो इस मामले में सिद्ध नहीं हुआ।
कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना विशिष्ट आरोप तय किए और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 313 के तहत अभियुक्त से संबंधित प्रश्न पूछे बिना दोषसिद्धि दर्ज करना न्यायिक प्रक्रिया के विपरीत है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने विनोद कुमार को आईपीसी की धारा 364 के तहत दी गई सात वर्ष की सजा रद्द कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह मामला वर्ष 1983 का है, जब इटावा के बरहपुरा थाने में बैजनाथ सिंह ने मुकदमा दर्ज कराया था। सत्र न्यायालय ने 21 फरवरी 1986 को अभियुक्त को सजा सुनाई थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया।
यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और अभियुक्त के अधिकारों की रक्षा को मजबूत करता है।



