ठेकेदार गिरफ्तार, फर्में ब्लैकलिस्ट… मगर जिन अफसरों की कलम से पास हुए टेंडर, उनकी जवाबदेही कब?
- फर्जी दस्तावेजों से लेकर रेट तय कराने और कमीशन के आरोपों तक पहुंची जांच
- 298 टेंडर निरस्त, जांच का दायरा 400 करोड़ तक
कानपुर नगर/ VMN। नगर निगम के करीब 200 करोड़ रुपये के टेंडरों में कथित भ्रष्टाचार की जांच अब उस मोड़ पर पहुंच गई है जहां केवल ठेकेदारों की गिरफ्तारी से सवाल खत्म नहीं होंगे। छह फर्मों के दस्तावेजों में कथित गड़बड़ी, टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप, कमीशन के कथित खेल और ठेकेदारों के बीच रेट तय कराने की शिकायतों के बाद अब सबसे बड़ा सवाल नगर निगम के उन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर है, जिनकी जांच, संस्तुति और हस्ताक्षरों के बाद ये टेंडर आगे बढ़े।
ठेकेदार पकड़े गए, एफआईआर हो गई, टेंडर निरस्त हो गए—अब फाइलों पर दस्तखत करने वालों की बारी कब?
‘कमर तोड़ो’ का अगला निशाना कौन?
मुख्यमंत्री की भ्रष्टाचार पर सख्ती के बाद नगर निगम में कार्रवाई तेज हुई। दो ठेकेदार गिरफ्तार हुए और छह के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई। 15वें वित्त आयोग से जुड़े करीब 298 कार्यों के टेंडर निरस्त किए गए। नई व्यवस्था में 15 प्रतिशत से अधिक कम दर वाली निविदाओं पर पुरानी व्यवस्था खत्म कर पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने का निर्णय हुआ।
लेकिन यह कार्रवाई एक बेहद बड़ा सवाल भी छोड़ गई है—
अगर टेंडर प्रक्रिया में सब कुछ नियमानुसार था तो इतनी बड़ी संख्या में टेंडर निरस्त करने और नियम बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?
और यदि प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं तो उस प्रक्रिया को मंजूरी देने वाले जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं?
फर्जी कागज लगाए गए तो सरकारी तंत्र ने आंखें क्यों मूंदी?
जांच में जिन छह फर्मों के दस्तावेजों पर सवाल उठे हैं, उनमें तिरुपति ट्रेडर्स, पारसनाथ बिल्डर्स, अजय इंटरप्राइजेज, मैसर्स दिलीप बाजपेई, जगदंबा इंटरप्राइजेज और कैलादेवी कंस्ट्रक्शन कंपनी के नाम सामने आए हैं।
रिपोर्टों के अनुसार कुछ फर्मों द्वारा हॉट मिक्स प्लांट, मशीनरी, उपकरण और अन्य तकनीकी पात्रता से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। जांच में इन दस्तावेजों के सत्यापन और वास्तविक स्थिति को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं।
यहीं से जांच का सबसे अहम सिरा निकलता है—
दस्तावेज फर्जी थे तो उन्हें बनाया किसने, यह जांच का एक हिस्सा है।
लेकिन उन दस्तावेजों को सही मानकर टेंडर प्रक्रिया में आगे बढ़ाने वाले कौन थे, यह उससे बड़ा सवाल है।
0.5 से 1 फीसदी का कथित खेल… किसकी जेब तक पहुंचा पैसा?
टेंडर प्रक्रिया में कथित रूप से रेट तय कराने और कमीशन के खेल के आरोप भी सामने आए हैं। प्रकाशित खबरों में 0.5 से 1 प्रतिशत तक कमीशन की कथित व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
अगर जांच में यह आरोप सही साबित होते हैं तो मामला केवल ठेकेदारों के बीच मिलीभगत का नहीं रहेगा।
जांच एजेंसियों को यह पता लगाना होगा कि—
कमीशन किसने मांगा?
किसने दिया?
किसके इशारे पर रेट तय हुए?
पैसा किस तक पहुंचा?
और इसके बदले किसे सरकारी काम मिला?
यही वे सवाल हैं जिनके जवाब इस पूरे मामले की असली तस्वीर सामने ला सकते हैं।
200 करोड़ से 400 करोड़ तक पहुंची कहानी
जांच का दायरा अब करीब 400 करोड़ रुपये के 27 ठेकों तक पहुंचने की बात सामने आई है। ऐसे में प्रत्येक टेंडर की फाइल को खंगालना जरूरी है।
किस फर्म ने कब आवेदन किया?
किसने दस्तावेजों की जांच की?
किस अधिकारी ने तकनीकी पात्रता दी?
किसने वित्तीय बोली खोली?
किसने अनुशंसा की?
किसने स्वीकृति दी?
काम किसे मिला?
और भुगतान किस आधार पर हुआ?
इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि भ्रष्टाचार केवल ठेकेदारों के स्तर पर था या पूरी व्यवस्था में कहीं गहरी सेंध लगी थी।
298 टेंडर रद्द—क्या अब पुरानी फाइलें भी खुलेंगी?
15वें वित्त आयोग के करीब 298 कार्यों के टेंडर निरस्त किए जाने के बाद अब केवल नए टेंडर कराना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि निरस्त किए गए प्रत्येक टेंडर की पुरानी फाइल का ऑडिट कराया जाए।
यदि किसी टेंडर में अपात्र फर्म को पात्र बनाया गया था तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
यदि दस्तावेजों का सत्यापन नहीं हुआ तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
यदि किसी ठेकेदार को अनुचित लाभ दिया गया तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
और यदि किसी अधिकारी ने जानबूझकर नियमों को नजरअंदाज किया तो उस पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।
ठेकेदारों का ‘गैंग’ था तो सरकारी सिस्टम में इनके संपर्क कौन?
पुलिस के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों में ठेकेदारों के कथित गैंग, दूसरे ठेकेदारों को टेंडर में भाग न लेने देने और कमीशनखोरी जैसे आरोप सामने आए हैं।
अगर जांच में संगठित नेटवर्क की पुष्टि होती है तो पुलिस को केवल फर्म संचालकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
किस-किस ठेके में यही पैटर्न दोहराया गया?
किन लोगों को लगातार काम मिला?
किन फर्मों ने एक-दूसरे के पक्ष में रास्ता बनाया?
क्या इनके बीच आर्थिक लेन-देन हुआ?
और क्या नगर निगम के किसी अधिकारी या कर्मचारी से इनकी सांठगांठ थी?
इन सवालों के जवाब जांच को निर्णायक दिशा दे सकते हैं।
असली ‘एक्शन’ अब शुरू होना चाहिए
ठेकेदारों पर एफआईआर और गिरफ्तारी को कार्रवाई की शुरुआत माना जा सकता है, लेकिन भ्रष्टाचार की जड़ तक पहुंचने के लिए सरकारी मशीनरी के भीतर की जिम्मेदारी तय करना जरूरी है।
क्योंकि कोई भी ठेका सिर्फ ठेकेदार की मर्जी से पास नहीं होता। उसके पीछे दस्तावेज होते हैं, सत्यापन होता है, तकनीकी परीक्षण होता है, समिति होती है, अधिकारियों की संस्तुति होती है और अंत में स्वीकृति की प्रक्रिया होती है।
इसलिए अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है—
“जिस फाइल पर ठेकेदार की बोली लगी, उस फाइल पर अफसर की कलम किसने चलाई?”
अगर ठेकेदार दोषी है तो कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन अगर किसी अधिकारी की लापरवाही, मिलीभगत या संरक्षण की भूमिका सामने आती है तो उसकी जवाबदेही भी उतनी ही कठोर होनी चाहिए।
अब जनता को चाहिए 10 सवालों के जवाब
1. छह फर्मों के दस्तावेजों का सत्यापन किस-किस अधिकारी ने किया?
2. कथित गलत दस्तावेज पहली बार किस स्तर पर स्वीकार किए गए?
3. फर्मों को तकनीकी रूप से पात्र किसने घोषित किया?
4. इन फर्मों को पिछले वर्षों में कितने ठेके मिले?
5. क्या उन सभी पुराने ठेकों की भी जांच होगी?
6. कथित कमीशन की रकम किस तक पहुंची, इसकी जांच हुई या नहीं?
7. 298 टेंडर निरस्त होने की प्रशासनिक जिम्मेदारी किसकी है?
8. 200 करोड़ से आगे बढ़ी जांच में संभावित सरकारी नुकसान कितना है?
9. क्या अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर अलग से एफआईआर या विभागीय जांच होगी?
10. क्या पूरी टेंडर प्रक्रिया का स्वतंत्र फोरेंसिक/वित्तीय ऑडिट कराया जाएगा?
ठेकेदारों पर शिकंजा कस गया, अब ‘सिस्टम’ की बारी
नगर निगम की कार्रवाई से यह संदेश जरूर गया है कि टेंडर में कथित गड़बड़ी को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। लेकिन इस मामले को मिसाल बनाने के लिए कार्रवाई को ठेकेदारों से आगे सिस्टम तक पहुंचाना होगा।
200 करोड़ के टेंडर हों या 400 करोड़ की जांच—सरकारी धन के हर रुपये का हिसाब होना चाहिए।
अब निगाह पुलिस की जांच पर ही नहीं, बल्कि उन फाइलों, सत्यापन रिपोर्टों, समिति की संस्तुतियों और अधिकारियों के हस्ताक्षरों पर भी है।
क्योंकि भ्रष्टाचार का असली चेहरा केवल वह नहीं होता जो पैसा लेता है—कई बार वह भी होता है जो नियमों की आंखों पर पट्टी बांधकर उस पैसे के रास्ते को साफ करता है।
अब देखना यही है—गिरफ्तारी की गूंज नगर निगम की फाइलों तक पहुंचती है या नहीं?



