- मोबाइल की लत युवाओं के लिए खतरा
- CSJMU में ‘फाइटिंग डिजिटल एडिक्शन’ कार्यक्रम
- डिजिटल अनुशासन अपनाने पर जोर
कानपुर नगर/(VMN) (RAJAT SAXENA)। मोबाइल और इंटरनेट का अनियंत्रित उपयोग युवाओं की एकाग्रता, मानसिक संतुलन और उत्पादकता के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।

छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) में आयोजित “फाइटिंग डिजिटल एडिक्शन” कार्यक्रम में जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि डिजिटल युग में तकनीक का संतुलित उपयोग ही सफलता की कुंजी है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में व्यक्ति की काबिलियत उसके डिजिटल व्यवहार, यानी ‘डिजिटल क्वोशेंट (DQ)’ से भी आंकी जाएगी।
जिलाधिकारी ने बताया कि बीसवीं शताब्दी में आईक्यू (IQ) काबिलियत का प्रमुख पैमाना था, जबकि इक्कीसवीं शताब्दी के शुरुआती दौर में ईक्यू (EQ) का महत्व बढ़ा। अब तेजी से बदलते डिजिटल युग में डी-क्यू (DQ) महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और भविष्य में यही व्यक्ति की क्षमता का प्रमुख मानक बनेगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय ‘अटेंशन इकॉनमी’ का है, जहां बड़ी तकनीकी कंपनियां लोगों का ध्यान अपने प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने के लिए मनोविज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल करती हैं। भारत में लगभग 97 करोड़ इंटरनेट/मोबाइल कनेक्शन होने के कारण मोबाइल फोन इस व्यवस्था का सबसे बड़ा माध्यम बन गया है।
डीएम ने बताया कि मोबाइल एप और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि उपयोगकर्ता बार-बार फोन चेक करें। इसमें ‘इंटरमिटेंट रिइन्फोर्समेंट’ का सिद्धांत काम करता है, जो कसीनो की स्लॉट मशीनों जैसा होता है। इससे मस्तिष्क में डोपामिन रिलीज होता है और व्यक्ति बार-बार स्क्रीन की ओर आकर्षित होता है।
उन्होंने 1954 में मैकगिल विश्वविद्यालय में हुए वैज्ञानिक प्रयोग का उल्लेख करते हुए बताया कि वैज्ञानिक जेम्स ओल्ड्स और पीटर मिल्नर ने पाया था कि डोपामिन के प्रभाव में चूहा भोजन और पानी छोड़कर बार-बार बटन दबाता रहा। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इसी सिद्धांत पर उपयोगकर्ताओं को लंबे समय तक जोड़े रखने का प्रयास करते हैं।
जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि तकनीक से दूरी बनाना समाधान नहीं है, बल्कि डिजिटल अनुशासन विकसित करना आवश्यक है। उन्होंने हाल ही में घोषित सिविल सेवा परीक्षा परिणाम का उदाहरण देते हुए कहा कि सफल अभ्यर्थियों में एक समानता यह रही कि उन्होंने तैयारी के दौरान मोबाइल और सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखी।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी पी. वी. सिंधु का उदाहरण देते हुए बताया कि पुल्लेला गोपीचंद की अकादमी में खिलाड़ियों के मोबाइल फोन सुबह चार बजे जमा कर लिए जाते हैं और सप्ताह के अंत में ही वापस दिए जाते हैं, जिससे उनका पूरा ध्यान अभ्यास पर केंद्रित रहता है।
क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट सृजन श्रीवास्तव ने कहा कि डिजिटल लत केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक समस्या भी है। इससे निपटने के लिए जागरूकता, आत्मनियंत्रण और परिवार व शिक्षकों की सक्रिय भूमिका जरूरी है। उन्होंने बताया कि इस पहल को तीन स्तरीय हस्तक्षेप मॉडल के रूप में लागू किया जाएगा—जिसमें छात्रों में डिजिटल अनुशासन विकसित करना, शिक्षकों व काउंसलरों को शुरुआती संकेत पहचानने का प्रशिक्षण देना और अभिभावकों को संतुलित डिजिटल वातावरण बनाने के लिए प्रेरित करना शामिल है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में लगभग 20 से 40 प्रतिशत युवा इंटरनेट एडिक्शन के जोखिम में हैं, जबकि कुछ अध्ययनों में कॉलेज छात्रों में यह आंकड़ा 51 प्रतिशत तक पाया गया है। अत्यधिक डिजिटल उपयोग का संबंध अवसाद, चिंता, तनाव और नींद संबंधी समस्याओं से भी जुड़ा पाया गया है।
कार्यक्रम में पारुल राजोरिया, डॉ. संदीप सिंह, डॉ. प्रियंका शुक्ला, डॉ. अनमोल श्रीवास्तव, सृजन श्रीवास्तव, दुर्गा यादव, अहमद अब्दुल्ला और आशीका मिश्रा सहित कई विशेषज्ञ मौजूद रहे।
डिजिटल लत के प्रमुख संकेत
- बिना कारण बार-बार मोबाइल चेक करना
- थोड़े समय के लिए फोन खोलकर घंटों ऑनलाइन रहना
- पढ़ाई या काम के दौरान ध्यान भटकना
- मोबाइल दूर होने पर बेचैनी या चिड़चिड़ापन
- देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद प्रभावित होना
- परिवार और दोस्तों के साथ समय कम बिताना
- आंखों में जलन, सिरदर्द या गर्दन-पीठ में दर्द
- सोशल मीडिया के बाद तनाव या तुलना की भावना
- ऑफलाइन गतिविधियों में रुचि कम होना
- कोशिश के बावजूद मोबाइल उपयोग नियंत्रित न कर पाना
यह समस्या केवल तकनीकी नहीं, बल्कि जीवनशैली से जुड़ी चुनौती है, जिसके लिए संतुलित उपयोग और अनुशासन जरूरी है।



